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तीन माह पहले विधायक बने महेंद्र यादव का टिकट भी पक्का नहीं

कांग्रेस सूत्रों ने स्पष्ट किया कि सर्वे रिर्पोट के आधार पर होगा टिकट का फैसला

शिवपुरी। कोलारस विधानसभा उपचुनाव कांग्रेस द्वारा स्व. रामसिंह यादव के निधन के बाद भावनात्मक तौर पर लड़ा गया था। पार्टी की सोच थी कि स्व. यादव के सुपुत्र महेंद्र यादव को यदि उम्मीदवार बनाया गया तो इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा। स्व. यादव के परिवार में से टिकट के लिए महेंद्र यादव से अधिक उनकी बहन मिथलेश यादव का दावा मजबूत था। क्योंकि मिथलेश यादव जिन्हें मुनिया के नाम से पुकारा जाता है, राजनीति में लम्बे समय से सक्रिय हैं। वह जिला पंचायत की सदस्य रह चुकी हैं और वर्तमान में जनपद पंचायत बदरवास की अध्यक्ष हैं। लेकिन उनके स्थान पर राजनीति से दूर व्यवसायिक महेंद्र यादव को टिकट दिया गया। इसमें पार्टी की सोच यह रही कि चुनाव में मोटा पैसा खर्च करने की साम्र्थय महेंद्र यादव में है। महेंद्र यादव चुनाव तो जीत गए लेकिन उनकी जीत बहुत बारीक रही। 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी के मैदान में रहते और उसके द्वारा 25 हजार मत बटोरने के बावजूद स्व. रामसिंह यादव 25 हजार मतों से चुनाव जीते। जबकि महेंद्र यादव बसपा उम्मीदवार की अनुपस्थिति के बावजूद महज 8 हजार मतों से ही उस स्थिति में चुनाव जीत पाए जब सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर पूरी ताकत लगा दी थी। भावनात्मक आधार पर चुनाव लडऩे का भी कांग्रेस को फायदा मिला। लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रोफेशनल अंदाज में चुनाव लडऩे के लिए तत्पर है। इस कारण तीन माह पहले ही जीते महेंद्र यादव के टिकट पर भी करैरा विधायक शकुंतला खटीक की तरह संकट के बादल नजर आ रहे हैं। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कोलारस सीट हमें हर हाल में जीतनी है और इसके लिए पार्टी श्रेष्ठ से श्रेष्ठ उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारेगी। 
कोलारस विधानसभा सीट 2008 के विधानसभा चुनाव से ही सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित हुई है। इसके पहले यह सीट अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित थी। सन् 1977 के चुनाव में यहां से जनता दल के  उम्मीदवार कामता खटीक चुनाव जीते थे लेकिन 1980 और 1985 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी पूरनसिंह बेडिय़ा ने विजयश्री प्राप्त की। सन् 1993 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी ओमप्रकाश खटीक जीते। जबकि सन् 98 के विधानसभा चुनाव में तीसरी बार विजय प्राप्त कर पूरनसिंह बेडिय़ा शिक्षा मंत्री बने। 2003 के विधानसभा चुनाव में पूरनसिंह का टिकट काटकर उन्हें शाढ़ौरा से चुनाव लड़ाया गया और कोलारस से श्रीमति अंगूरी जाटव को टिकट दिया गया। जिससे ओमप्रकाश खटीक आसानी से चुनाव जीत गए। इस तरह से सन् 1977 से 2003 तक के हुए 7 चुनावों में भाजपा ने चार बार और कांग्रेस ने तीन बार विजयश्री प्राप्त की। 2008 के चुनाव से कोलारस के स्थान पर करैरा विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हुआ और कोलारस सीट सामान्य हुई। तब से अब तक कोलारस विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव सहित तीन चुनाव हो चुके हंै। जिनमें दो चुनाव कांग्रेस ने और एक चुनाव में महज 300 मतों से भाजपा ने विजयश्री हांसिल की है। 2008 में भाजपा के देवेंद्र जैन ने कांग्रेस प्रत्याशी रामसिंह यादव को हराया था। आंकड़ों के मान से देखें तो इस विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की तुलना में कांग्रेस का पलड़ा किंचित भारी रहा है। लेकिन पिछले उपचुनाव में जिस ताकत से भाजपा ने चुनाव लड़ा उससे ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा में बाजी पलटने की क्षमता है। बशर्ते कि प्रत्याशी दमदार हो। जबकि सामान्य होने के बाद हुए तीनों चुनावों में भाजपा ने देवेंद्र जैन को उम्मीदवार बनाया। देवेंद्र जैन 1993 में शिवपुरी से भी विधायक रह चुके हैं। लेकिन कोलारस उनकी जन्मस्थली है। उपचुनाव हारने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संदेश दिया कि वह 2018 का चुनाव कोलारस से अवश्य जीतेंगे। यशोधरा राजे सिंधिया भी उपचुनाव हारने के बाद कोलारस घूम आई हैं। भाजपा प्रदेश कार्य समिति सदस्य सुरेंद्र शर्मा भी लगातार कोलारस की जनसमस्याओं के लिए सचेत बने हुए हैं। ऐसी स्थिति में यदि कांग्रेस ने 2018 के चुनाव को हल्के से लिया और भावनात्मक आधार पर महेंद्र यादव को पुन: उम्मीदवार बनाया तो पार्टी की यह एक बड़ी रणनीतिक भूल भी साबित हो सकती है। कांग्रेस के लिए खुशी की बात यह है कि उसके पास कोलारस में योग्य उम्मीदवारों का टोटा नहीं है। जिला कांग्रेस अध्यक्ष बैजनाथ सिंह यादव स्व. रामसिंह यादव के बाद यादव बिरादरी में सर्वाधिक प्रभाव रखते हैं और उपचुनाव में उनकी अलावदी पोलिंग से कांग्रेस प्रत्याशी महेंद्र यादव को सर्वाधिक बढ़त हांसिल हुई थी। श्री यादव की पत्नी कमला यादव जिला पंचायत अध्यक्ष हैं और उनके सुपुत्र रामवीर यादव जनपद पंचायत बदरवास के उपाध्यक्ष हैं। जिला कांग्रेस अध्यक्ष बैजनाथ सिंह यादव में विधानसभा क्षेत्र के लगभग 25 से 30 हजार यादव मतों को अपने पक्ष में करने की क्षमता है। स्व. रामसिंह यादव की सुपुत्री मिथलेश यादव की दावेदारी भी काफी प्रबल मानी जा सकती है। मिथलेश में उनके पिता स्व. रामसिंह यादव की छवि नजर आती है। वह व्यवहार कुशल, संवेदनशील और मेहनती हैं। कोलारस नगर पंचायत अध्यक्ष रविंद्र शिवहरे भी एक अच्छे प्रत्याशी साबित हो सकते हैं। वह लगातार तीन बार से कोलारस नगर पंचायत अध्यक्ष या तो खुद बने है या एक बार उन्होंने अपनी पत्नी निशा शिवहरे को अध्यक्ष बनवाया है। स्व. रामसिंह यादव के नजदीकी सांसद प्रतिनिधि और प्रदेश कांग्रेस महामंत्री हरवीर सिंह रघुवंशी की उम्मीदवारी भी काफी प्रभावी है। हरवीर सिंह सांसद सिंधिया के नजदीकी हैं और वह चुनाव लडऩे के भी इच्छुक हैं। लेकिन सवाल यह है कि तीन माह पहले जीते महेंद्र यादव का टिकट क्यों काटा जाए? भावनात्मक आधार पर यह सोच ठीक है। लेकिन कोलारस में 2018 के चुनाव में भावना का कोई स्थान नहीं है और दमदारी से कांग्रेस को यदि चुनाव लडऩा है तो उसे पूरी गंभीरता के साथ महेंद्र यादव के विकल्प के बारे में भी सोचना होगा। इस कसौटी पर यदि महेंद्र यादव खरे उतरे तो टिकट उनका अन्यथा और भी मजबूत दावेदार हैं मैदान में। 

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