
शिवपुरी। शिवपुरी जिले की पांच विधानसभा सीटों पर पिछले चुनावों में अपेक्षा के विपरीत कांग्रेस ने भले ही शानदार प्रदर्शन करते हुए तीन सीटों पर विजयश्री हासिल की, लेकिन कांग्रेस अपने अच्छे प्रदर्शन के बावजूद शिवपुरी और पोहरी विधानसभा सीट पर कब्जा नहीं कर पाई। पोहरी विधानसभा सीट पर कांग्रेस को 1993 के पश्चात विजय हासिल नहीं हुई है। 1998 से 2013 के बीच हुए चार चुनावों में से वर्ष 2008 में हुए चुनाव में तो कांग्रेस प्रत्याशी को अपनी जमानत तक से हाथ धोना पड़ा था। शिवपुरी विधानसभा सीट पर यदि 2007 के उपचुनाव के परिणाम को छोड़ दिया जाए तो 1985 के बाद कांग्रेस यहां से कभी नहीं जीत पाई। कांग्रेस को 1990, 93, 98, 2003, 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में लगातार छह बार हार का सामना करना पड़ा। यही कारण है कि प्रदेश में सत्ता बनाने का सपना देख रही कांग्रेस के लिए शिवपुरी और पोहरी सीट चिंता का कारण बनी हुई है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस 2018 के विधानसभा चुनाव में इन सीटों पर कब्जा कर पाएगी अथवा हर बार की तरह इस बार भी उसे निराशा का सामना करना पड़ेगा।
शिवपुरी विधानसभा सीट एक तरह से भाजपा की परम्परागत सीट मानी जाती है। भाजपा के लिए प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थिति में शिवपुरी सीट पर उसे विजय मिलती रही है। 1993 और 1998 के विधानसभा चुनाव में जब पूरे प्रदेश में कांग्रेस की लहर थी और दोनों विधानसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस ने सत्ता बनाई थी उस समय भी शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र पर भाजपा का कब्जा रहा था। 1993 में कांग्रेस के मजबूत प्रत्याशी स्व. सांवलदास गुप्ता को भाजपा के प्रत्याशी और उनके समधी देवेन्द्र जैन ने लगभग 4 हजार मतों से पराजित किया था। 1998 में जब कांग्रेस ने यहां से बहुत मजबूत प्रत्याशी हरिबल्लभ शुक्ला को टिकट दिया, लेकिन भाजपा ने यशोधरा राजे सिंधिया को मैदान में उतारा। चुनाव में यशोधरा राजे सिंधिया ने कांग्रेस प्रत्याशी हरिबल्लभ शुक्ला को लगभग 7 हजार मतों से धूल चटा दी। 2003 में जब प्रदेश में भाजपा की लहर चल रही थी तो इस सीट से भाजपा की प्रत्याशी यशोधरा राजे सिंधिया 25 हजार से अधिक मतों से विजयी हुईं। उन्होंने कांग्रेस के दो बार विधायक रहे गणेश गौतम को पराजित किया था। 2008 में भाजपा प्रत्याशी माखनलाल राठौर और 2013 में यशोधरा राजे सिंधिया ने शिवपुरी सीट से विजयश्री को वरण किया, लेकिन 2003 में चुनाव जीतने के बाद यशोधरा राजे सिंधिया ने ग्वालियर लोकसभा उपचुनाव लड़ा तो उनके इस्तीफे से रिक्त हुई सीट पर अवश्य कांग्रेस प्रत्याशी वीरेन्द्र रघुवंशी विजयी हुए, लेकिन उस विजय में कांग्रेस का कौशल कम था और इलाके में खासा जनाधार रखने वाली भाजपा नेत्री यशोधरा राजे की नाराजगी का अधिक महत्वपूर्ण स्थान था। भाजपा ने यशोधरा राजे की इच्छा के विपरीत कांग्रेसी गणेश गौतम को उनकी पार्टी से इस्तीफा दिलाकर टिकट दिया था। उपचुनाव में सांसद सिंधिया की मेहनत और यशोधरा राजे सिंधिया के अप्रत्यक्ष सहयोग से वीरेन्द्र रघुवंशी भले ही कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीत गए हों, लेकिन उस जीत पर कांग्रेस इठलाने की स्थिति में कतई नहीं थी। कुल मिलाकर शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र भाजपा का परम्परागत क्षेत्र माना जाता है और यहां सिंधिया परिवार का प्रभाव सर्वाधिक है। हालांकि शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र से पिछले कुछ चुनाव परिणाम आश्चर्यजनक भी रहे हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में सिंधिया परिवार के प्रभाव के बावजूद सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया इस सीट से बुरी तरह पराजित हुए थे। खासतौर पर शहरी क्षेत्र में तो उन्हें लगभग 15 हजार मतों से पराजित होना पड़ा था। गनीमत रही कि ग्रामीण क्षेत्रों में वह 10 हजार मतों से जीत गए, लेकिन कुल मिलाकर शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र से वह भाजपा प्रत्याशी जयभान सिंह पवैया से 5 हजार मतों से पीछे रहे। इस कारण शिवपुरी विधानसभा सीट कांग्रेस की चिंता का कारण है। पोहरी विधानसभा सीट पर कांग्रेस आखिरी बार 1993 में जीती थी जब कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी श्रीमती बैजन्ती वर्मा ने भाजपा प्रत्याशी स्व. जगदीश वर्मा को पराजित किया था। इसके बाद 1998, 2003, 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को लगातार पराजय का सामना करना पड़ा। 1998 में भाजपा प्रत्याशी नरेन्द्र बिरथरे ने कांग्रेस प्रत्याशी बैजन्ती वर्मा को पराजित किया था। 2003 में यह सीट समानता दल के खाते में गई जब समानता दल प्रत्याशी हरिबल्लभ शुक्ला ने कांग्रेस प्रत्याशी बैजन्ती वर्मा और भाजपा प्रत्याशी नरेन्द्र बिरथरे को पराजित किया था। 2008 और 2013 में दोनों चुनावों में यहां से भाजपा प्रत्याशी प्रहलाद भारती जीतने में सफल रहे। कुल मिलाकर 1998 से 2013 के बीच हुए चार चुनावों में से तीन चुनावों में भाजपा ने विजयश्री हासिल की जबकि कांग्रेस की झोली बिल्कुल खाली रही। इस कारण पोहरी विधानसभा सीट कांग्रेस की चिंता का कारण है। इसे सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया भी महसूस करते हैं और उनका कहना है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में मैं स्वयं इस सीट पर नजर रख रहा हूं। देखना यह है कि 2018 में कांग्रेस पोहरी के गढ़ पर कब्जा जमा पाएगी अथवा हर बार की तरह पोहरी का गढ़ भाजपा के लिए अभेद रहेगा।






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