
शिवपुरी। देश के चौथे स्तंभ माने जाने वाले पत्रकारों की स्वतंत्रता पर चुनाव आयोग द्वारा नकेल कसने का पहला प्रयास सामने आया है। वर्तमान में प्रदेश सहित देश में भाजपा के जो हालात हैं वह किसी से छुपे नहीं है, जहां देखो वहां जनप्रतिनिधि, विधायक से लेकर मंत्री और मुख्यमंत्री तक को जनता का विरोध झेलना पड़ रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि भाजपा को अपनी हार का डर सताने लगा है। भाजपा के ही डर के बीच चुनाव का आयोग का भी चौकाने वाला फरमान सामने आया है। सूत्रों की मानें तो चुनाव आयोग इस बार विधानसभा चुनाव के लिए सिर्फ जिले के प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ब्यूरो को कार्ड जारी करेगी। इसके अलावा सोशल मीडिया के केवल अधिमान्य पत्रकारों को। कुल मिलाकर चुनाव आयोग के इस फरमान के बाद मीडिया के गिने चुने लोग ही बच जाएंगे और इतने कम मीडियाकर्मियों के लिए पूरे जिलेभर में चुनाव की गतिविधियों पर कवरेज करना नामुमकिन होगा। वहीं दूसरे पहलू पर बात करें तो चुनाव में होने वाली कथित गड़बडिय़ां या बूथ कैपचरिंग जैसी घटनाओं पर पर्देदारी करने का प्रयास होगा। या फिर यूं कहा जाए कि चुनाव आयोग यह सब सत्ताधारी दल के इशारों पर फरमान जारी कर रहा है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि इससे पहले तो जिले सहित तहसीलों के पत्रकार एवं फोटोग्राफरों के भी कार्ड जारी होते थे, लेकिन इस बार चुनाव आयोग को ऐसा क्या सूझा कि उसे ऐसा फरमान जारी करना पड़ा। कुल मिलाकर चुनाव आयोग द्वारा मीडिया के पर कतरने की तैयारी में है जो किसी भी धांधली को उजागर करने की अहसियत रखती है। शिवपुरी में हाल ही में जिला निर्वाचन अधिकारी और जनसंपर्क अधिकारी के बीच में गुप्तगू हुई। जिसमें चुनाव आयोग के फरमान का हवाला देते हुए केवल ब्यूरो को कार्ड बनाने की बात कही।
एक पत्रकार कैसे कवर करेगा सैंकड़ों पोलिंग बूथ को
यहां बता दें कि जब प्रिंट मीडिया या फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से सिर्फ एक पत्रकार को ही चुनाव मतदान केन्द्र और मतगणना स्थल पर जाने का कार्ड बनेगा तो फिर जिले की पाँचों विधानसभाओं की सैंकड़ों पोलिंग बूथ पर वह कैसे कवरेज करेगा, यह समझ से परे है। इससे पूर्व ऐसा कोई परमान जारी नहीं हुआ है, फिर इस बार ऐसा फरमान क्यों फिलहाल इसका कोई जबाव स्पष्ट नहीं है?
चुनाव की निष्पक्षता पर उठेंगे सवाल
चुनाव आयोग द्वारा जिस तरीके से मीडिया की स्वतंत्रता को कुचले का प्रयास किया है, उससे ऐसा लगता है कि इस फरमान के बाद कहीं न कहीं चुनाव की निष्पक्षता भी प्रभावित होगी। क्योंकि मीडिया ही एक ऐसा माध्यम है जो हर गतिविधि को चुनाव के समक्ष रखता है जब मीडिया पर ही लगाम कस दी जाएगी तो फिर तो तथाकथित मनमानी की भी गुंजाइश बनती है।
…तो फिर क्या सोशल मीडिया पेड न्यूज के दायरे से होगी बाहर?
जिस तरीके से सोशल मीडिया के लिए केवल अधिमान्य पत्रकारों को चुनाव आयोग ने कार्ड जारी करने की बात कही जा रही है इससे ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग अन्य लोगों को पत्रकारों की श्रेणी में नहीं मानती तो फिर इन्हें पैड न्यूज के दायरे से भी बाहर रखना चाहिए क्योंकि जब इनको पत्रकार माना ही नहीं जा रहा तो फिर पैड न्यूज काहिकी। नहीं जनाव ऐसा नहीं है यहां तो चित्त भी इनका और पट्ट भी इन्हीं का है।






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