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अगर बच्चे न बताएं तो कैसे जाने कि बच्चा असुरक्षित है | Shivpuri News


कार्यकर्ताओं ने पूछा तो अधिकारी ने बताया यौन शोषण से बचाव का तरीका
शिवपुरी। आज बचपन को हिफाजत की सबसे ज्यादा जरूरत है।बाल यौन शोषण के आंकड़े बताते है कि हर तीसरा बच्चा किसी न किसी प्रकार की यौन हिंसा का शिकार होता है।जबकि इस अपराध की रोकथाम के लिये कठोरतम कानून बना हुआ है।यह दुर्भाग्य पूर्ण है कि बचपन को संरक्षित करने वाले हाथों के द्वारा ही उसका शोषण हो रहा है।जिसका मूल कारण खामोशी है,क्योंकि बचपन में प्रतिकार की समझ नहीं है और परिजनों का बच्चों पर ध्यान नहीं है। यौन उत्पीडऩ पीडि़त 75 फीसदी बच्चे इस बात का जिक्र किसी से नहीं करते। हाल ही में जिले में घटित एक 4 वर्षीय मासूम के साथ एक निकट रिस्तेदार के द्वारा यौन शोषण की घटना का (बगैर पहचान उजागर किए) जिक्र करते हुए बाल संरक्षण अधिकारी राघवेन्द्र शर्मा ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण कार्यक्रम में यह चिंता व्यक्त की।उन्होंने कहा कि परिजनों की अनदेखी बचपन को असुरक्षित बना देती है।

कैसे पता चलेगा कि बच्चे का शोषण हो रहा है ?

प्रशिक्षण में उपस्थित आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने पूछा कि माता-पिता या परिजनों को जब तक बच्चे के द्वारा इस प्रकार के शोषण की जानकारी नहीं दी जाती तब कैसे तय किया जाए कि बच्चा असुरक्षित है।इस पर अधिकारी शर्मा ने बताया कि अमूमन हम यह मानते है कि बच्चा घर-परिवार या रिस्तेदारों के साथ सुरक्षित है तो यह हमारी बहुत बड़ी भूल है,क्योंकि बच्चा माता पिता की नजरों से ओझल होते ही कहीं पर भी शोषण का शिकार हो सकता है। अगर कोई बच्चा इस तरह के अनुभव से गुजऱ रहा है तो वो लोगों से बचने लगता है।कई बार वो कुछ ख़ास लोगों के पास जाने से साफ़ इनकार कर देगा।लोग उसे डरावने प्रतीत होने लगते है।

इसके अलावा अगर बच्चा अपने निजी अंगों में दर्द की शिकायत करे तो इसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।कई बार ऐसा भी होता है कि बच्चे ख़ुद के शरीर को छिपाना शुरू कर देते हैं।मां अगर बोले कि मैं नहला दूं या शरीर पर तेल लगा दूं तो वो मना कर देते हैं या कपड़े पहनकर नहाने की जि़द करते हैं।यह सभी यौन शोषण के संकेतक है।

जब कोई बच्चा यौन शोषण या शारीरिक शोषण का शिकार होता है तो वह मानसिक शोषण का शिकार भी होता है। मानसिक उत्पीडऩ से गुजर रहे बच्चे अपनी उम्र के बच्चों से अलग बर्ताव करते हैं। कुछ मामलों में ये बेहद उग्र और आक्रामक हो जाते हैं तो कुछ में एकदम शांत और गुमसुम। अगर किसी बच्चे के शरीर पर चोट या घाव का ऐसा निशान है जिसकी कोई साफ़ मेडिकल वजह नहीं है, तो हो सकता है कि वह शारीरिक उत्पीडऩ का सामना कर रहा हो।अगर किसी बच्चे में आत्मविश्वास की कमी है, वो ख़ुद को कोसता रहता है, हर तरह की ग़लतियों के लिए ख़ुद को जि़म्मेदार ठहराता और किसी पर भरोसा नहीं कर पाता तो मुमकिन है कि वह कभी न कभी मानसिक उत्पीडऩ का शिकार हुआ है। कोई बच्चा अपने शरीर को लेकर शर्मिंदा महसूस करता है, ख़ुद से नफऱत करता है और लोगों के कऱीब आने से डरता है तो यह भी यौन उत्पीडऩ के संकेत है।

क्या है बाल यौन शोषण ?

अधिकारी राघवेंद्र शर्मा का कहना है कि अमूमन लोग सिफऱ् पेनिट्रेशन (बलात्कार) को ही यौन शोषण से जोड़कर देखते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। बचपन की यौन शोषण से सुरक्षा के कानून पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन फ्ऱॉम सेक्शुअल ऑफ़ेंसेज) के अनुसार बच्चे को ग़लत तरीक़े से छूना, उसके सामने ग़लत हरकतें करना और उसे अश्लील चीज़ें दिखाना-सुनाना भी इसी दायरे में आता है। यौन उत्पीडऩ के पीडि़त बच्चों के लिए भारत सरकार की हेल्पलाइन 1098 मौजूद है।बड़ों को चाहिए को वो इन्हें इस बारे में बताएं ताकि बच्चे मुशीबत के समय में मदद ले सकें। बच्चों के माता-पिता भी हेल्पलाइन पर फ़ोन कर सकते हैं। यह जानना भी जरूरी है कि पीडि़त बच्चे पर आरोप साबित करने का दबाव नहीं होता है बल्कि आरोपी पर इस बात का दबाव होता है कि वो ख़ुद के बचाव में सबूत पेश करे।

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