इंदौर। अंग्रेजी में कमजोर विद्यार्थियों ने एमबीए की परीक्षा में हिंदी में उत्तर लिखने की यूनिवर्सिटी से छूट मांगी है। विद्यार्थियों ने कुलपति से कहा है कि परीक्षा से अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म की जाए व भाषा के आधार पर कॉपियों का मूल्यांकन नहीं किया जाए।यूनिवर्सिटी ने जनवरी के दूसरे सप्ताह से एमबीए फर्स्ट और थर्ड सेमेस्टर की परीक्षा रखी है। इसे ध्यान में रखते हुए हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों ने 29 दिसंबर को यूनिवर्सिटी को ई-मेल कर हिंदी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उत्तर लिखने की सुविधा मांगी। साथ ही लिखा कि मूल्यांकन भी दोनों भाषाओं में किया जाए। विद्यार्थियों के मुताबिक अंग्रेजी की अनिवार्यता होने से कुछ छात्र बेहतर ढंग से उत्तर नहीं लिख पाते हैं, जिससे उन्हें कम नंबर मिलते हैं।अधिकारियों का कहना है कि परीक्षा में ऐसा करना संभव नहीं है, क्योंकि जांचने वाले प्रोफेसर कम हैं। परीक्षा नियंत्रक डॉ. अशेष तिवारी का कहना है दोनों भाषाओं का नियम अभी लागू नहीं किया गया है। इसके लिए बोर्ड ऑफ स्टडीज के सदस्यों से चर्चा की जाएगी। उसके बाद ही यूनिवर्सिटी फैसला करेगी। वैसे जनवरी के पहले सप्ताह में बैठक बुलाई गई है। मामले में कुलपति से भी राय ली जाएगी।
सफल नहीं हुआ प्रयोग
सालभर पहले आरजीपीवी ने बीई की परीक्षा में हिंदी में जवाब लिखने की छूट दी थी, लेकिन प्रयोग सफल नहीं हो पाया। कुछ ही विद्यार्थियों ने इसका फायदा उठाया। जानकारों के मुताबिक बीई और एमबीए जैसे प्रोफेशनल कोर्स में यह संभव नहीं है, क्योंकि इनकी किताबें सिर्फ अंग्रेजी भाषाओं में उपलब् रहती हैं।






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