शिवपुरी। सूचना का अधिकार अधिनियम जनता के हितों के लिए है और इससे न केवल सरकारी कामकाज में पारदर्शिता आई है। बल्कि अफसरशाही की मनमानी और अन्याय पर भी अंकुश लगा है। उक्त बात मप्र के चुनाव आयुक्त आत्मदीप ने सर्किट हाऊस पर पत्रकारों से चर्चा करते हुए कही। उन्होंने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम अन्य किसी भी कानून से अधिक प्रभावी है। यदि किसी कानून में कोई धारा का प्रभाव सूचना के अधिकार नियम में वर्णित किसी धारा के खिलाफ जाता है तो उस स्थिति में सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा ही प्रभावी होगी। उन्होंने बताया कि जब उन्होंंने कार्यभार संभाला तब ग्वालियर चंबल संभाग में 2007 के 17 हजार मामले लंबित थे और हर साल 1 हजार मामलों की और वृद्धि हो रही थी। लेकिन उन्होंने लोक अदालते लगाकर सारे मामलों का निराकरण कर दिया है। लोक अदालतों में वीडियो कॉन्फ्रिेसिंग का भी इस्तेमाल किया गया है। ताकि पक्षकार को भोपाल आने जाने से मुक्ति मिल सके।सूचना आयुक्त आत्मदीप ने अपने अनुभवों का जिक्र करते हुए कहा कि उनके समक्ष एक ऐसा मामला आया। जिसमें आवेदिका के हायर सेकेण्डरी परीक्षा के अंक 93 प्रतिशत से अधिक थे औरा उसका चयन संविदा शिक्षक ेके लिए हो गया था। लेकिन डाक द्वारा नियुक्ति पत्र समय पर न पहुंचने के कारण उसके स्थान पर शिक्षा विभाग ने किसी अन्य की नियुक्ति कर दी थी। लेकिन उन्होंने सूचना आयुक्त के रूप में इस पर संज्ञान लिया और विभाग से प्रमाण मांगे कि उन्होंने नियुक्ति पत्र यूपीएससी से भेजा थाद्ध दूसरा उदाहरण सूचना आयुक्त आत्मदीप ने देते हुए बताया कि एक छात्रा दीक्षा शुक्ला जो कि उज्जैन यूनिवर्सिटी की छात्रा थी उसे सारे विषयों में अच्छे नम्बर मिले थे लेकिन एकॉउटेंसी मैनेजमेंट में बहुत कम नम्बर आए थे। लेकिन जब उसने विश्वविद्यालय से उस विषय की उत्तर पुस्तिका मांगी तो विश्वविद्यालय ने उत्तर पुस्तिका नियमों का हवाला देकर देने से इंकार कर दिया और उच्च न्यायालय से भी उसे राहत नहीं मिली। लेकिन उन्होंने इस मामले में संज्ञान लेकर निर्देश दिया कि मूल्यांकित उत्तर पुस्तिका एक लोक अभिलेख है और इसे दिया जाना चाहिए। लेकिन विश्वविद्यालय ने उसके स्थान पर किसी अन्य विषय की उत्तर पुस्तिका उसे दे दी जब वह छात्रा उनके समक्ष आई तो उनके द्वारा कार्रवाई करने के पूर्व ही विश्वविद्यालय ने अपनी गलती मानकर उक्त छात्रा की उत्तर पुस्तिका उसे दे दी। महिला बाल विकास के एक कर्मचारी मनोज कोठरिया का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उक्त कर्मचारी के सेवानिवृत होने के बाद भी विभाग द्वारा उसके 20 लाख रूपए नहीं दिए जा रहे थे। विभाग यह भी नहीं बता रहा था कि उक्त रूपए क्यों रोके गए है। उन्होंने महिला बाल विकास विभाग से उक्त कर्मचारी के सर्विस संबंधित सारे दस्तावेज तलब किए और उनसे जबाव तलव किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि विभाग ने उक्त कर्मचारी को साढ़े 17 लाख रूपए का भुगतान किया तथा कहा कि पेंशन के ढ़ाई लाख रूपए भी शीघ्र दे दिए जाएंगे। इन उदाहरणों से आत्मदीप ने बताया कि वह समाजसेवा के तौर पर अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं और उन्हें बहुत संतुष्टि महसूस हो रही है।
चुनाव आयुक्त बहुत आए लेकिन शेषन की बात निराली थी
चुनाव आयुक्त आत्मदीप ने बताया कि इस कानून में उनके पास असीमित शक्तियां है, बस आवश्यकता उन्हें जनहित में उपयोग करने की है। उन्होंने बताया कि चुनाव आयोग के पास कितनी शक्तियां होती है यह टीएन श्ेाषन से पहले कोई नहीं पहचान पाया। सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत कार्यवाही करते हुए जब उनके निर्णय से एफआईआर दर्ज होती है किसी का नामांतरण होता है तो उस खुशी का कोई अंत नहीं है। खासबात यह है कि इस कानून में उनके पास विवेकाधिकार शक्तियां भी है जिसके जरिए वह आम नागरिक के हित में अधिक सक्षमता से कार्य कर सकते हैं।






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