2013 के चुनाव में आमने सामने लड़े प्रतिद्वंदियों के बीच चुनाव के आसार
शिवपुरी। जिले की पांच सीटों में से भाजपा के लिए सर्वाधिक चिंता वाली सीट पिछोर रही है। यहां भाजपा अनुकूल से अनुकूल परिस्थिति में भी 1993 के पश्चात चुनाव नहीं जीत सकी है। लोधी बाहुल्य इस विधानसभा क्षेत्र में पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती का भी जादू नहीं चला और उनके भाई स्वामी प्रसाद लोधी को भी इस विधानसभा क्षेत्र में पराजय का सामना करना पड़ा। पूर्व मंत्री और पिछोर के कदावर नेता लक्ष्मीनारायण गुप्ता को भी केपी सिंह से हार का सामना करना पड़ा था और इसके बाद श्री गुप्ता सक्रिय राजनीति से बाहर हो गए थे। पूर्व मंत्री भैया साहब लोधी और भाजपा के जिला महामंत्री जगराम सिंह यादव को भी केपी सिंह के हाथों हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन बाहरी उम्मीदवार प्रीतम लोधी ने पिछले विधानसभा चुनाव में केपी सिंह को लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर दिया था। इस बार भी उम्मीद है कि कांग्रेस की ओर से जहां केपी सिंह मैदान में उतरेंगे वहीं भाजपा 2013 के चुनाव में लड़े प्रीतम लोधी पर ही दाव लगाएगी।
कांग्रेस की गुटीय राजनीति में दिग्गी खेमे के माने जान ेवाले केपी सिंह पिछोर विधानसभा क्षेत्र के करारखेड़ा के निवासी हैं। लेकिन 1993 से पहले पिछोर से उनका कुछ ज्यादा लेना देना नहीं था। उनकी राजनैतिक सक्रियता और काम धंधे ग्वालियर में चलते थे। 1993 में उन्होंने पिछोर से विधानसभा टिकट कांग्रेस से मांगा और दिग्विजय सिंह खेमे होने के बावजूद भी उन्हें टिकट स्व. माधवराव सिंधिया की एनओसी प्राप्त होने के बाद मिला। चुनाव में उनका मुकाबला उस समय के राजस्व मंत्री लक्ष्मीनारायण गुप्ता से हुआ। लेकिन केपी सिंह ने मुकाबले को एकतरफा बना दिया और वह लगभग 20 हजार मतों से चुनाव में विजयी हुए। पिछोर विधानसभा क्षेत्र लोधी बाहुल्य है। लोधी मतदाताओं के बाहुल्य के कारण भाजपा ने 1998 के विधानसभा चुनाव में पूर्व मंत्री भैया साहब लोधी को चुनाव मैदान में उतारा। भैया साहब लोधी ने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में 1980 और 1985 के विधानसभा चुनाव में पिछोर से जीत हासिल की थी। पिछोर के जातिगत गणित को देखकर यह संभावना व्यक्त की जा रही थी कि भैया साहब केपी सिंह को पराजित कर देंगे, लेकिन केपी सिंह ने इस विधानसभा क्षेत्र के जातिगत गणित को झुठलाते हुए लगभग 18 हजार मतों से जीत हासिल की थी जबकि चुनाव मैदान में बसपा का उम्मीदवार भी था। 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मुख्यमंत्री पद के लिए उमा भारती की उम्मीदवारी घोषित की। उस दौरान प्रदेश में भाजपा के पक्ष में अच्छी लहर थी। उमा भारती ने कांग्रेस के पिछोर गढ़ को ढहाने के लिए अपेन भाई स्वामीप्रसाद लोधी को चुनाव मैदान में उतारा। भाजपा ने इस चुनाव को जीतने के लिए पूरी ताकत लगाई, लेकिन केपी सिंह चुनाव में लोधी बर्शेज अन्य मुद्दे को प्रभावी करने में सफल रहे और वह लगभग 16 हजार मतों से चुनाव जीत गए। 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जगराम सिंह यादव को चुनाव मैदान में उतारा। 1998 के चुनाव में भाजपा से लड़े भैया साहब लोधी ने पार्टी से विद्रोह कर जनशक्ति पार्टी उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरने का निर्णय लिया, लेकिन जीत केपी सिंह को हासिल हुई और वह लगभग 20 हजार मतों से चुनाव जीतने में सफल रहे। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस सीट को हारी हुई मानकर चुनाव लड़ा और बाहरी उम्मीदवार प्रीतम लोधी को चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन जो कमाल 1993 से भाजपा उम्मीदवार नहीं कर पाए थे वह प्रीतम लोधी ने कर दिखाया। भाजपा इस सीट पर इतनी निराशाजनक स्थिति में थी कि किसी भी बड़े नेता की पिछोर में सभा नहीं हुई। इसके बाद भी प्रीतम लोधी महज साढ़े 6 हजार मतों से चुनाव में पराजित हुए। इसलिए इस बार भी विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के रूप में प्रीतम लोधी का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। प्रीतम लोधी की क्षेत्र में सक्रियता भी बढ़ गई है। उनके ग्रामीण क्षेत्र के दौरे भी शुरू हो गए हैं और ऐसा कयास लगाया जा रहा है कि भाजपा इस बार उन्हें पुन: चुनाव मैदान में उतारेगी, लेकिन देखने वाली बात यह है कि क्या भाजपा इस बार पिछोर के कांग्रेसी गढ़ को भेद पाने में सफल रहेगी अथवा 1993 से अब तक पिछोर के किले पर कांग्रेस का कब्जा यथावत जारी रहेगा।
पिछोर में सर्वाधिक मतदाता लोधी जाति के
पिछोर विधानसभा क्षेत्र में लोधी मतदाताओं की संख्या लगभग 45 हजार है। इसके अलावा 20 हजार से अधिक यादव मतदाता, 20 हजार ब्राहमण मतदाता और गहोई समाज के लगभग 15 हजार मतदाता हैं। इसके बाद भी लोधी उम्मीदवार को अभी तक पिछोर में इसलिए मात मिल रही है, क्योंकि लोधियों के विरूद्ध अन्य सभी समुदाय एकजुट होकर कांग्रेस को जिता देते हैं। देखना यह है कि क्या इस बार भी वहीं होगा अथवा पिछोर विधानसभा क्षेत्र में एक नए इतिहास का सृजन होगा।





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