
शिवपुरी। शासकीय श्रीमंत माधवराव सिंधिया स्नातकोत्तर महाविद्यालय शिवपुरी में कार्यरत अतिथि विद्वान डॉ रामजी दास राठौर ने अतिथि विद्वानों की वर्तमान दशा के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हुए बताया कि
मध्य प्रदेश के शासकीय महाविद्यालयों में कार्यरत अतिथि विद्वानों के रोजगार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं क्योंकि पीएससी द्वारा चयनित सहायक प्राध्यापकों की चयन प्रक्रिया प्रारंभ हो रही है। मध्य प्रदेश उच्च शिक्षा विभाग में 15 – 20 वर्षों तक लगातार न्यूनतम वेतन पर कार्य करने के बाद भी अतिथि विद्वानों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो सकता है। कई अतिथि विद्वान इस व्यवस्था में अपनी सेवाएं देते हुए काल कल्वित हो चुके हैं। आज उनका परिवार विषम परिस्थितियों से जूझ रहा है। उनके सामने ना किसी तरह की पेंशन है ना परिवार को पालने के अन्य कोई आर्थिक साधन जो सरकार द्वारा प्रदान किए गया हो । इस सेवा में कार्य करने वाले विद्वानों के साथ यह बड़ी विषम परिस्थितियां हैं कि ऑन ड्यूटी दुर्घटना होने पर भी उनको किसी तरह की आर्थिक सहायता सरकार द्वारा प्रदान नहीं की गई। हम सब भारतीय संविधान में अपनी आस्था एवं विश्वास रखते हैं । भारतीय संविधान की परिभाषा में इस बात को कहा गया है कि समान कार्य समान वेतन सभी को मिलना चाहिए। आजादी के इतने साल बाद भी अस्थाई कर्मचारियों को समान कार्य समान वेतन तो छोड़िए जीवन रक्षक आधारभूत सुविधाओं को पूरा करने के लिए भी पर्याप्त वेतन तक नहीं दिया जा रहा है। अतिथि विद्वानों संबंधी इस व्यवस्था में अतिथि विद्वानों को ₹8000 प्रतिमाह से प्रारंभ होकर ₹15000 एवं वर्तमान में लगभग 1 वर्ष ही हुआ है ₹35000 प्रति माह वेतन प्राप्त होना प्रारंभ हुआ है। हर महीने की 1 तारीख को उन्हें वेतन प्राप्त नहीं हो पाता विगत 6 माह से उनको समय पर वेतन नहीं मिल पा रहा है।जीवन के महत्वपूर्ण ऊर्जावान समय को अपने त्याग समर्पण सेवा के द्वारा छात्र छात्राओं के हित को ध्यान में रखते हुए कार्य करने के बावजूद भी मध्यप्रदेश शासन द्वारा अतिथि विद्वानों के हित में कोई फैसला नहीं लिया जा रहा है। अतिथि विद्वान योग्य हैं इसलिए वर्षों तक अतिथि विद्वानों का चयन मेरिट के आधार पर हुआ है। इस प्रक्रिया को भी पूर्ण पारदर्शिता के साथ लागू किया गया। समय-समय पर मध्य प्रदेश पीएससी की भर्तियां भी होती रहीं लेकिन जैसा कि हम जानते हैं सरकार किसी की भी रही हो भ्रष्टाचार का अपना अलग स्थान रहा है। योग्यता का हनन हमेशा से होता रहा है कहीं ना कहीं से सिस्टम के साथ जुड़कर अयोग्य लोग योग्य लोगों पर प्रभावी रहे हैं। लेकिन प्रश्न इस बात का है कि यदि अतिथि विद्वान अयोग्य थे और सरकार को उनकी आवश्यकता नहीं थी तो उन्हें पहले ही हटा दिया जाना चाहिए था। योग्य अतिथि विद्वानों के साथ इस तरह विगत 15 वर्षों से सरकारों द्वारा छलावा किया जाता रहा है। हमारे देश में कहा तो यह जाता है कि हम सबको शोषण के विरुद्ध अधिकार प्राप्त है लेकिन इस अतिथि विद्वान की व्यवस्था में अस्थाई रूप से कार्य करने के कारण शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक शोषण अतिथि विद्वानों का किया गया। यदि कभी किसी कार्य में भ्रष्टाचार की बात करें तो लगभग 2 वर्ष की तनख्वाह के बराबर रिश्वत की बात सुनाई देती है लेकिन यहां 15- 20 वर्षों तक लगातार कार्य करने के बाद, पारिवारिक आर्थिक संघर्षों को सहन करने के बाद, शासन के वचन पत्र में होने के बाद, आज शासन यदि यह कहे कि अब हमको अतिथि विद्वानों की आवश्यकता नहीं है तो यह माना जाएगा भारतीय व्यवस्था में न्याय व्यवस्था पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकी है। मैं यह नहीं कहता सभी चयनित व्यक्ति गलत हैं लेकिन इस बात की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जिस गति से चयन प्रक्रिया को प्रारंभ किया गया, कई बार उसमें संशोधन किया गया, परीक्षा परिणाम आने पर कई सवाल खड़े हुए, कहीं ना कहीं तो लापरवाही रही है लेकिन जिन लोगों का चयन हो चुका उन लोगों को बहुत बधाई लेकिन प्रश्न इस बात का है कि उम्र के इस पड़ाव पर आने के बाद, शासन की आजीवन सेवा करने के बाद, शासन की कोई सुविधा, किसी भी तरह का लाभ न मिलने के बाद, आज अतिथि विद्वानों को बाहर का रास्ता दिखाया जाता है तो यह कहां का न्याय होगा। समय की मांग है पूरे मध्य प्रदेश एवं देश से अस्थाई कर्मचारियों की व्यवस्था को संपूर्ण रूप से समाप्त किया जाए। क्योंकि जिस तरह अतिथि विद्वानों ने अपनी जिंदगी को बर्बाद किया है उस तरीके से आने वाले समय में देश का युवा इस तरह की भ्रम जाल में तो नहीं फसेगा तथा समय रहते अपने लिए योग्य रोजगार का चयन कर लेगा। देश को आजाद होने के बावजूद आज भी किसी ना किसी रूप में बेरोजगारों को अल्प समय के रोजगार प्रदान कर उनका शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण किया जा रहा है। चुनावों के समय सभी राजनीतिक पार्टियां युवाओं को रोजगार देने की बात करती हैं लेकिन यह कैसे रोजगार जो कुछ समय के लिए दिए जाते हैं उनमें भी उनको भरपूर वेतन एवं सुविधाएं नहीं दी जाती तथा जब वह काफी काम कर चुके होते हैं, कार्यक्षमता में परिवर्तन आने लगते हैं, तो उनसे कहा जाता है कि अब आप हमारे किसी काम के नहीं हैं। अस्थाई कर्मचारी, अतिथि विद्वान,अतिथि शिक्षक, अस्थाई संविदा कर्मी, इन सभी के नामों से चल रही शासन की योजनाओं को तत्काल प्रभाव से बंद कर देना चाहिए। फैसला एक ही बार हो जाए कि आपका रोजगार सुरक्षित है या नहीं? आप इस रोजगार में जुड़िए अन्यथा आपके जीवन में जो बेहतर रोजगार आपको लगता है उस रोजगार का आप चयन कीजिए। इस तरह आने वाले समय में देश के होनहार युवा बर्बाद होने से बचाए जा सकेंगे।






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