अपनी मांगों को लेकर चाहे जब झण्डा, डंडा उठा लेते हैं शिक्षक

शिवपुरी। मध्य प्रदेश शासन द्वारा संविदा शिक्षक, गुरूजी, जैसे पदों पर शिक्षकों की भर्ती की गई। जिनका मानदेय 500, 2500, 3500 तथा 5000 रूपए रखा गया। उक्त शिक्षकों की भर्ती यह सोचकर की गई थी कि शिक्षा की गुणवत्ता में कुछ तो सुधार होगा। लेकिन शासन की मंशा के अनुसार परिणाम न आते हुए उसके विपरीत ही आ रहे हैं। शासन द्वारा इन शिक्षकों की महज 3 वर्ष के लिए संविदाकर्मी के रूप में की गई थी। शिक्षकों से शासन द्वारा किए गए अनुबंध के आधार पर 3 वर्ष वाद शासन द्वारा इन्हें हटाने के अधिकार अपने पास ही रखे। साथ ही 3 वर्ष बाद ही इन्हें परमानेंट करना भी शासन के ही हाथ में था। शासन ने विद्यालयों की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उक्त शिक्षकों को समय-समय पर परमानेंट कर दिया। साथ ही शिक्षकों का पूरा वेतनमान भी इन शिक्षकों को देना प्रारंभ कर दिया। अब इन शिक्षकों को कम से कम 30 हजार से लेकर 50 हजार रूपए तक वेतन प्राप्त हो रहा है। लेकिन इसके बाबजूद भी शिक्षकों द्वारा अपने कर्तव्य का निर्र्वहन ईमानदारी से नहीं किया जा रहा हैं। अधिकांश शिक्षक विद्यालय महज समय पास करने के लिए जा रहे हैं तथा कुछ शिक्षक तो शासन द्वारा दिया जा रहा वेतन पेंशन की तरह ले रहे हैं। इतना ही नहीं कुछ शिक्षकों ने तो हद ही कर दी। उनके द्वारा चार-पांच हजार रूपए में अपने स्थान पर दूसरा कोई बेरोजगार युवा भाड़े पर लगाकर उसकी बेरोजगारी का फायदा उठाया जा रहा हैं।
शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने व शिक्षकों की विद्यालय में उपस्थिति निश्चित करने के लिए शासन द्वारा ई अटेंडेंस का कार्यक्रम प्रारंभ किया गया जिससे यह पता लग सके की शिक्षक स्कूल पहुंच रहे हैं अथवा नहीं। जिसका शिक्षकों द्वारा लगातार विरोध किया जा रहा है। जबकि शासन द्वारा नियमानुसार शिक्षकों को भरपूर वेतन दिया जा रहा हैं। इसके बाबजूद भी न तो शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आ रहा है और न ही शिक्षक विद्यालय जाने के लिए गंभीर नजर आ रहे हैं। बल्कि इसके विपरीत ई अटेंडेंस का विरोध किया जा रहा है। शिक्षकों का कहना है कि वे लगातार विद्यालय समय से जा रहे हैं। जब शिक्षक समय से विद्यालय जा रहे हैं तो ई अटेंडेंस का विरोध क्यों? शिक्षकों द्वारा अपनी मांगों को लेकर समय-समय पर धरना प्रदर्शन, आंदोलन जैसी प्रक्रिया अपनाई जाती हैं लेकिन शासन द्वारा निर्धारित कायदे कानूनों को मानने को कतई तैयार नहीं हैं। जबकि शिक्षक शासन के कर्मचारी हैं। तब शासन की बात को मानना अनिर्वाय हो जाता हैं। शिक्षक वैसे तो राष्ट्र निर्माता कहा जाता हैं। जब शिक्षक ही शासन के नियम, कायदे कानूनों का उल्लंघन करने पर अमादा हैं तो अपने छात्रों को ये कैसी शिक्षा देंगे। इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता हैं।
न्यायालय ने भी लगाई शिक्षकों को फटकार
ई अटेंडेंस का गत 3 वर्षों से शिक्षकों द्वारा लगातार विरोध ही नहीं किया जा रहा बल्कि कुछ शिक्षक तो शासन के आदेश के विरूद्ध न्यायालय में भी जा पहुंचे हैं अरविन्द दीक्षित तथा अन्य नौ के द्वारा शासन के आदेश के विरोध में 8.2.2018 को याचिका क्रमांक 7551/2018 दायर की गई थी। उच्च न्यायालय ग्वालियर की खण्डपीठ द्वारा आयुक्त लोकशिक्षण भोपाल को सभी पहलूओं पर गंभीरता से विचार विमर्श कर निर्णय लेने के लिए अधिकृत किया था। जिसके अनुसार शिक्षकों को 20 जुलाई से अनिवार्य रूप से ई अटेंडेंस लगानी होगी। इसी के चलते सोमवार को सभी विकास खण्डों में एम.शिक्षा मित्र एफ के उपयोग की ट्रेनिंग भी दी गई है। इस ट्रेनिंग में उन्हें बताया गया है कि उक्त एप उपयोग करने पर उन्हें हर माह नेट के लिए पैसा भी दिया जाएगा। ट्रेनिंग के दौरान संबंध में भी चर्चा की गई। यदि सभी शिक्षकों पर एन्ड्रोयड मोबाईल नहीं तो शाला प्रभारी सभी शिक्षकों की अटेंडेंस अपने मोबाइल से लगा सकता हैं। यदि नेटवर्क संबंधी कोई परेशानी होती तो उसकी सूचना वरिष्ठ कार्यालय को देना होगी।
छात्र शिक्षक अनुपात गड़बड़ाया
स्कूल शिक्षा विभाग के नियमानुसार एक शिक्षक के लिए 40 छात्र होना आवश्यक हैं ग्रामीण क्षेत्रों के तो क्या जिला मुख्यालय पर ही शासकीय विद्यालयों की स्थिति बद से बदतर हालत में है जहां पर शासकीय विद्यालयों में छात्रों के अनुपात में शिक्षकों की संख्या कहीं ज्यादा हैं लेकिन इसके बाबजूद भी शिक्षा की गुणवत्ता में कोई सुधार होने का नाम नहीं ले रहा है। विद्यालयों में छात्रों की दर्ज संख्या तो सैकड़ों में कागजों में दिख जायेगी लेकिन उपस्थिति न के बराबर ही रहती हैं और अब तो स्थिति यहां तक खराब हो गई है कि शासकीय विद्यालयों में दर्ज संख्या तो कम हैं किन्तु शिक्षकों की भरमार वेतहासा बनी हुई है। पूर्व में युक्तयुक्तिकरण के तहत हुए स्थानांतरणों पर दृष्टिपात करें तो एक बड़ा घोटाला सामने आ सकता हैं। क्योंकि पोर्टल पर जो छात्र संख्या दर्शायी गई थी वह छात्र संख्या वास्तिविकता में बहुत कम थी। जिसकी पुष्टि वरिष्ठ अधिकारियों ने शाला के अभिलेखों से की ही नहीं और जहां पर पांच शिक्षक हटाए जाने थे वहां पर मात्र एक शिक्षक को अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। अब प्रश्न उठता हैं कि जो शेष बचे चार शिक्षक फ्री का मुक्त का वेतन पूरे सालभर तक लेते रहे इसका जिम्मेदार कौन हैं?







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