कोलारस और करैरा सीट पर बारी बारी से जीतती रही है कांग्रेस और भाजपा
शिवपुरी। शिवपुरी जिले की पांच विधानसभा सीटों में से शिवपुरी और पोहरी दो सीटें ऐसी हैं जिन्हें पिछले रिकॉर्ड के आधार पर भाजपा के लिए मजबूत माना जा सकता है जबकि पिछोर सीट पर कांग्रेस का पिछले पांच विधानसभा चुनावों से कब्जा है। इस कारण 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए शिवपुरी और पोहरी विधानसभा सीट भाजपा के कब्जे से छीनना चुनौतीपूर्ण रहेगा। वहीं भाजपा पिछोर में कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगाने की तैयारी में रहेगी।
शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र में 1985 के बाद हर प्रतिकूल परिस्थिति में भाजपा जीतती रही है। 1998 और 2003 के विधानसभा चुनाव में जब प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता बनी थी और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए थे उस चुनाव में भी शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा का परचम फहराया था। इस विधानसभा क्षेत्र में मुख्य रूप से वैश्य, कुशवाह और राठौर जाति के मतदाताओं का बाहुल्य है और जिन्हें भाजपा का प्रतिबद्ध मतदाता माना जाता है। यही कारण है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भी इस विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के उम्मीदवार ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव हार गए थे। शहरी क्षेत्र में श्री सिंधिया को भाजपा उम्मीदवार जयभान सिंह पवैया से लगभग 14 हजार मत कम मिले थे। इसकी भरपाई उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र से की, लेकिन इसके बावजूद भी शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र से वह भाजपा उम्मीदवार से 5-6 हजार मतों से पीछे रहे। इस विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की मजबूत स्थिति का दूसरा कारण यह है कि यहां से पार्टी की ताकतवार उम्मीदवार यशोधरा राजे सिंधिया लड़ती रही है। कांग्रेस ने इस विधानसभा क्षेत्र से 1985 के बाद सिर्फ 2007 के उपचुनाव को छोड़कर जीत का स्वाद नहीं चखा है। 1989 में यहां से स्व. सुशील बहादुर अष्ठाना, 93 में देवेंद्र जैन, 98 में यशोधरा राजे, 2003 में यशोधरा राजे सिंधिया, 2008 में माखनलाल और 2013 में यशोधरा राजे चुनाव में विजयी रही थी और सभी भाजपा के हैं। 2007 के उपचुनाव में भले ही कांग्रेस के वीरेंद्र रघुवंशी ने भाजपा उम्मीदवार गणेश गौतम को पराजित किया था, लेकिन सभी जानते हैं कि उसमें कांग्रेस का कौशल कम बल्कि भाजपा की भितरघात अधिक जिम्मेदार थी। कांग्रेस यहां से 2007 को छोड़कर आखिरी बार 1985 में जीती थी जब कांगे्रस के गणेश गौतम ने भाजपा उम्मीदवार को पराजित किया था। भाजपा ने पिछले चुनाव मेें इस विधानसभा क्षेत्र से लगभग 11 हजार मतों से विजयश्री हासिल की थी और यशोधरा राजे ने उस चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार वीरेंद्र रघुवंशी को पराजित किया था। बाद में रघुवंशी स्वयं भाजपा में शामिल हो गए। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यही है कि शिवपुरी सीट से भाजपा के एकाधिकार को वह कैसे खत्म करे। कांग्रेस के लिए मुश्किल सीट पोहरी भी है। यहां से कांग्रेस अंतिम बार 1993 में विजयी हुई थी तब कांग्रेस उम्मीदवार बैजयंती वर्मा ने भाजपा उम्मीदवार जगदीश वर्मा को पराजित किया था। इसके बाद से कांग्रेस इस विधानसभा क्षेत्र से कभी नहीं जीती है। सन 1998 में भाजपा के नरेंद्र बिरथरे, 2003 मेें समानता दल के हरिवल्लभ शुक्ला, 2008 और 2013 में भाजपा के प्रहलाद भारती चुनाव जीते हैं। 2008 में तो कांग्रेस उम्मीदवार की इस विधानसभा क्षेत्र में जमानत जब्त हो गई थी। इस विधानसभा क्षेत्र से पिछले चुनाव से पहले कभी भी वर्तमान विधायक दूसरी बार चुनाव नहीं जीत पाया था, लेकिन भाजपा के प्रहलाद भारती ने इस रिकॉर्ड को तोड़ दिया था। 2018 के चुनाव में सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस पोहरी सीट पर गहन दिलचस्पी दिखा रही है। सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्वयं इस सीट की कमान अपने हाथ में लेने के संकेत दिए हैं। देखना यह है कि क्या पोहरी सीट पर कांग्रेस भाजपा के एकाधिकार को आगामी विधानसभा चुनाव में तोडऩे में सफल रहेगी। वहीं भाजपा के लिए पिछोर विधानसभा सीट अबूझ पहेली बनी हुई है। भाजपा ने यहां अंतिम बार 1989 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की थी तब भाजपा के लक्ष्मीनारायण गुप्ता चुनाव जीतकर प्रदेश सरकार में राजस्व मंत्री बने थे। श्री गुप्ता सिंधिया परिवार के काफी नजदीकी रहे हैं, लेकिन 1993 में इस विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार केपी सिंह जो जीते तो आज तक भाजपा उन्हें हरा नहीं पाई। कांग्रेस विधायक केपी सिंह पिछोर से 1993, 98, 2003, 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव लगातार पांच बार जीतने में सफल रहे हैं। पहले चार चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार केपी सिंह की जीत का अंतर लगभग 20 हजार मतों का रहा, लेकिन अंतिम चुनाव में केपी सिंह महज साढ़े 6 हजार मतों से ही चुनाव जीत पाए। खास बात यह है कि इस विधानसभा क्षेत्र में लोधी मतदाताओं का बाहुल्य है और भाजपा ने लोधी उम्मीदवार के रूप में भैया साहब स्वामी प्रसाद लोधी आदि को भी मैदान में उतारा, लेकिन फिर भी वह चुनाव नहीं जीत सके। इस चुनाव में भाजपा पिछोर सीट पर कांग्रेस के कब्जे को खत्म करने की तैयारी में अवश्य है, लेकिन उसे सफलता मिलेगी या नहीं इसका वक्त ही जवाब देगा।





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