
शिवपुरी। चार माह से सो रहे देव 19 नवंबर को उठ जाएंगे। लेकिन देव के उठने के साथ ही शादी विवाह की शहनाइयां नहीं गूंज सकेंगी। कारण देव के उठते समय गुरु ग्रह अस्त रहेगा। गुरु ग्रह 7 दिसंबर को उदय होगा। इसके बाद ही शादी समारोह शुरू हो सकेंगे। 9 दिन बाद पुन: गुरु धनु राशि में प्रवेश कर जाएंगे। इसी के साथ खर मास शुरू हो जाएगा। जिससे शादी विवाह पर फिर रोक लग जाएगी। नए साल में 17 दिन बाद यानि 17 जनवरी को मांगलिक कार्य का पहला शुभ मुहूर्त होगा।
बता दें कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी, जिसे देव शयनी एकादशी भी कहा जाता है, से भगवान निद्रा में चले जाते है। 23 जुलाई को देवशयनी एकादशी होने से इस दिन से शादी, विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्यों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लग जाता है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को चार माह देव जागते हैं। 19 नवंबर को देवउठनी ग्यारस को देव जाग जाएंगे। लेकिन इस बार देव जागने के बाद शहनाई नहीं गूंज सकेंगे। पंडित अखिलेश शर्मा बताते है कि विवाह में गुरु व शुक्र का उदय होना जरुरी होता है। इस साल 12 नवंबर को गुरु गृह अस्त हो रहे है। गुरु अस्त होने के कारण देव उठावनी ग्यारस से विवाह शुरू नहीं हो सकेंगे। गुरु 7 दिसंबर को उदय होंगे। गुरु उदय होने के बाद विवाह शुरू हो सकेंगे। लेकिन 16 दिसंबर को गुरु स्व राशि धनु में प्रवेश करेंगे। गुरु के स्वयं के घर में पहुंच जाने पर खरमास शुरू हो जाएगा। खर मास में भी मांगलिक कार्य शुभ कार्य प्रतिबंधित रहते है। इसलिए 14 जनवरी 2019 तक के लिए मांगलिक कार्य पर रोक लग लाएगी।
तुलसी विवाह की भी परंपरा
इस दिन को तुलसी विवाह के रूप में भी मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की शादी तुलसी जी के साथ हुई थी। लोगों को इस दिन तुलसी पूजन भी करना चाहिए।
गन्नो के मंडप में शाम 5 बजे के बाद करें पूजन
देवउठनी एकादशी को घर के आंगन में ईख, गन्नाा का मंडप बना कर उसमें भगवान को विराजमान कराएं। विधि विधान से पूजन करने के बाद उनकी परिक्रमा करें। पंडित अखिलेश शर्मा के अनुसार देव उठानी ग्यारस को पूजन का श्रेष्ठ मुहूर्त शाम 5:25 बजे से 7:05 बजे तक व रात्रि 10:26 बजे से 12 बजे तक है। पारंपरिक रूप से गौधूलि बेला के साथ ही पूजन किया जा सकता हैं।






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