
लुकवास के ग्राम आनंदपुर में जारी है श्रीमद् भागवत कथा
शिवपुरी-भगवान ने संसार में जब जब अवतार लिया है तब तब वह भक्तों के यहां प्रेम के बंधन में बंध कर ही आए हैं क्योंकि अगर भगवान किसी बंधन में बंध सकते है तो एकमात्र प्रेम का बंधन है रामहि केवल प्रेम प्यारा। जान लेहि जो जानन हारा। ईश्वर को तो केवल प्रेम से ही देखा जा सकता है जिसके पास में प्रेम भक्ति है उस प्रेम भक्ति के द्वारा ही व्यक्ति भगवान का दर्शन कर पा सकता है और इसी प्रेम के वशीभूत भगवान भक्तों के यहां प्रकट होते है उक्त आर्शीवचन दिए प्रसिद्ध श्रीमद भागवत कथा वाचक व ऊ नम: शिवाय मिशन के आचार्य पंडित बृजभूषण महाराज ने जो स्थानीय लुकवास के ग्राम आनंदपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस के दौरान कथा प्रसंग को उपस्थित श्रद्धालुजनों को श्रवण करा रहे थे।
कथा में महाराज बृजभूषण ने बताया कि शास्त्रों में पुराणों में वेदों में परमात्मा को प्राप्ति का एकमात्र साधन प्रेम ही बताया गया है और वह भी प्रेम निष्कपट होना चाहिए निष्कपट का अर्थ होता है जिसमें कोई स्वार्थ ना हो अगर कोई व्यक्ति परमात्मा को बिना किसी स्वार्थ के भजता है तो भगवान उसके लिए हर जगह मौजूद हैं और वह जहां चाहेंगे वही पर भगवान प्रकट हो जाएगे। उन्होंने बताया कि अनेकों उदाहरण हमारे पुराणो में आए कि प्रह्लाद के कारण भगवान नृसिंह बनकर के आ गए और खंभे में से प्रकट हो गए ध्रुव तो मात्र 5 वर्ष के थे और भगवान दर्शन देने आ गये द्रोपदी का चीर बचाने के लिए भगवान दौड़े दौड़े आये शबरी ने भगवान का इंतजार किया और प्रेम की डोर में बंध कर भगवान उसको दर्शन देने आये सूरदास हो तुलसीदास हो सभी ने भगवान को प्रेम से पाया है और परमात्मा का रूप भी प्रेम ही है इसलिए परमात्मा को सिर्फ ऐसे भजो जिस प्रकार हम पैसे का ध्यान करते है हमारे घर का ध्यान करते हैं हमारी प्रत्येक वस्तु का ध्यान करते है हमारे बच्चों का ध्यान करते है हमारे रिश्तेदारों का ध्यान करते है कहीं ऐसा ना हो कि वो हमसे दूर हो जाए, कोई हमारे धन को न चुरा ले जाए कहीं ऐसा ना हो हमारे बालक दूर चले जाए उसी प्रकार भगवान का ध्यान करो कहीं भगवान दूर ना चले जाएं कहीं भगवान हमसे रूठ ना जाए संसार की वस्तुओं से प्रेम करते है वेसे ही हमारा परमात्मा में हो जाए तो परमात्मा कहीं भी दूर नहीं है वह तो ह्रदय के अंदर है। इन प्रवचन को सुन उपस्थित श्रद्धालुजन भावविभोर हो गए और महाराज के आर्शीवचनों को ग्रहण कर धर्मलाभ प्राप्त किया।






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