तहसीलदार ने माना था लिपिकीय त्रुटि से नहीं हुआ अमल
शिवपुरी। बदरवास तहसील के ग्राम मैघोनाबड़ा के करीब आधा सैंकड़ा गरीब भूमिहीन किसानों को दिग्विजय सिंह की कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2002 में जमीन के पट्टे आवंटित किए थे। ताकि वह उक्त जमीन पर खेती कर अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करते हुए जीवनयापन कर सकें। उक्त पट्टों को अमल में लाने के लिए किसान पिछले कई सालों से तहसील न्यायालय में कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। इस कानूनी लड़ाई में भी वर्ष 2016 में उनकी जीत हुई और तहसीलदार ने आदेश किया कि किसानों के पट्टे अमल में लाए जाएं, लेकिन लालफीताशाही का आलम देखिए कि गरीब किसान रिश्वत नहीं दे पाए तो उनके पट्टे अमल में ही नहीं लाए गए। किसानों ने जब पटवारी से गुहार लगाई तो पटवारी ने किसानों से कहा कि पांच-पांच हजार रुपये दे दोगे तो पट्टा अमल में आ जाएगा। किसानों ने साहूकार से कर्जा लेकर पटवारी को घूस दी ताकि उनकी जमीन का पट्टा अमल में आ सके। पटवारी ने भी किसानों को फर्जी भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका बनाकर पकड़ा दी। पीड़ित किसान कैलाश पुत्र बाबू खंगार, रामसिंह पुत्र बसंती आदिवासी, सोमा पुत्र बुद्धा, बद्री पुत्र मुलुआ आदिवासी सहित तमाम किसान इन 20 सालों में सैंकड़ों बार अधिकारियों से गुहार लगा चुके हैं, लेकिन आज तक पट्टे अमल में नहीं आ पाए हैं।
तहसीलदार ने माना था लिपिकीय त्रुटि से नहीं हुआ अमल
किसान कैलाश पुत्र बाबू खंगार निवासी मैघोनाबड़ा ने भूमि सर्वे क्रमांक 241 मिन 1 रकवा 0.40 हेक्टेयर भूमि का पट्टा अभिलेख में अमल करने के लिए आवेदन पेश किया। प्रकरण का अवलोकन करने के उपरांत तहसीलदार ने आदेश करते हुए कहा कि इस न्यायालय के प.क्र./19/99-2000/अ-19 आदेश दिनांक 22 फरवरी 2002 से उक्त आवेदक को भूमि का पट्टा प्रदाय किया गया है, किंतु लिपिकीय भूल से उक्त पट्टा अभिलेख में अमल नहीं हो पाया है, जिसे अमल में लाया जाना उचित है। उक्त आदेश 19 फरवरी 2016 को पारित किया गया। उक्त फैसले के बाबजूद आज तक आदेश अमल में नहीं आ पाया है।
कंप्यूटर पर दिखवाते हैं तो जमीन सरकारी बोलती है
किसानों का कहना है कि पटवारी ने उन्हें किताब बनाकर दी है और कहा था कि आपकी जमीन के पट्टे अमल में आ गए हैं, लेकिन जब हम इस किताब और खसरे को ले जाकर कंप्यूटर पर निकलवाते हैं तो जमीन आज भी सरकारी ही दर्ज है। हालांकि किसानों का कहना है कि जमीन पर उनका कब्जा है और वह जमीन जोत भी रहे हैं, लेकिन उनकी जमीन आज तक उनके नाम पर सरकारी दस्तावेजों में चढ़ाई नहीं गई है।






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