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 राम मंदिर पहुंचा 2400 किलो का घंटा एटा से : आवाज गूँजेगी 2 KM तक , 3 महीने में तैयार किया 75 कारीगरों ने ; खर्च 25 लाख का / अयोध्या

अयोध्या

एटा के जलेसर से 2400 किलो का एक बड़ा घंटा लाया गया है, साथ में 50-50 किलो के 7 घंटे भी हैं। ध्या। - Dainik Bhaskar

एटा के जलेसर से 2400 किलो का एक बड़ा घंटा लाया गया है, साथ में 50-50 किलो के 7 घंटे भी हैं। ध्या।

घुंघरु घंटी उद्योग की नगरी एटा के जलेसर से 2400 किलो का घंटा बुधवार सुबह अयोध्या पहुंचा। अष्टधातु के इस घंटे को सैकड़ों व्यापारी फूलों से सजे रथ से अयोध्या लाए हैं। जिसे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को समर्पित किया गया। इस घंटे की आवाज शांत माहौल में करीब 2 किमी तक सुनाई दे सकती है।

घंटे का सांचा 75 कारीगरों ने 3 महीने में तैयार किया। 70 कारीगरों ने महज 25 मिनट में इस घंटे को ढालकर तैयार किया। जिसे बनाने में करीब 25 लाख का खर्च आया। इसके साथ ही 50-50 किलो के 7 अन्य घंटे भी ट्रस्ट को समर्पित किए गए। बताया जा रहा है कि जलेसर के घंटे पूरे विश्व में मशहूर हैं। घंटों के बजाने से ऊं की ध्वनि गूंजती है।

कारोबारी मनोज मित्तल ने बताया कि पिता विकास मित्तल की स्मृति में इस घंटे को तैयार किया गया है। 8 जनवरी को एटा से एक प्रतिनिधिमंडल जुलूस के साथ अयोध्या के लिए निकला था। पहले 2100 किलो का घंटा बनाने का लक्ष्य रखा गया था। फिर बाद में उत्साह और बढ़ा तो इसे 2400 किलो का बनवाया गया।

2400 किलो के घंटे को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को समर्पित किया गया।

2400 किलो के घंटे को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को समर्पित किया गया।

पिता ने 2100 किलो का घंटा राम मंदिर में लगाने का लिया था संकल्प
मनोज मित्तल ने बताया, पिताजी और जलेसर नगर पालिका के पूर्व चेयरमैन विकास मित्तल ने राम मंदिर में 2100 किलो का घंटा अर्पित करने का संकल्प लिया था। आज वे हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन इस ऐतिहासिक मौके पर हम उनके संकल्पों को पूरा कर राम मंदिर को 2400 किलो का घंटा अर्पित कर रहे हैं।

50-50 किलो के सात अन्य घंटे भी एटा से लाए गए हैं।

50-50 किलो के सात अन्य घंटे भी एटा से लाए गए हैं।

“इतना बड़ा घंटा ना बना है और ना ही बनेगा”
विकास मित्तल ने बताया कि घंटे की ढलाई 25 मिनट में करने के बाद इसकी फीनिशिंग की गई। 2400 किलो के घंटे पर निर्माता कंपनी सावित्री ट्रेडर्स एवं उसके मालिक प्रशांत मित्तल, मनोज मित्तल, आदित्य मित्तल का नाम भी लिखा जाएगा। इस घंटे से जलेसर की पहचान विश्व में होगी। इतना बड़ा घंटा अभी तक ना बना है और ना ही बनेगा। ये 6 फीट से ज्यादा ऊंचा है।

50-50 किलो के सात अन्य घंटे मंदिर ट्रस्ट को समर्पित किए गए।

50-50 किलो के सात अन्य घंटे मंदिर ट्रस्ट को समर्पित किए गए।

घंटे को बजाने से निकलती है ऊं की ध्वनि
जलेसर के पीतल के घंटे पूरे विश्व में जाने जाते हैं। जहां चाहे 2000 किलो का घंटा हो या फिर 50 ग्राम की घंटी…इसे बजाने से ऊं की प्रतिध्वनि गूंजती है। घंटी के कारीगरों में छोटी घंटियों से लेकर बड़े-बड़े घंटों तक बनाने के लिए जलेसर ही जाना जाता है। इसी वजह से इसे एक जिला एक उत्पाद के रूप में भी यूपी सरकार ने बढ़ावा दिया। जलेसर ही नहीं, अगर मुरादाबाद में भी पीतल पर कुछ काम करना हो तो जलेसर की मिट्टी को ही आयात किया जाता है।

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