पार्टी आलाकमान से ज्योतिरादित्य की नाराजगी की चर्चा, प्रदेश बैठकों से सिंधिया ने दूरी बनाने का किया ऐलान
सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश में एक मात्र ऐसे वरिष्ठ कांगे्रस नेता हैं जो खुले रूप में दो वर्षों से 2018 चुनाव के लिए कांग्रेस द्वारा मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किए जाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी मांग के प्रति जिस तरह से कांगे्रस आलाकमान का अवज्ञा और उपेक्षापूर्ण रूख बना हुआ है उससे राजनीतिक हल्कों में चर्चा है कि सांसद सिंधिया की पार्टी आलाकमान से नाराजगी बढ़ रही है। श्री सिंधिया ने प्रदेश कांग्रेस प्रभारी दीपक बावरिया द्वारा बुलाई जा रही बैठकों से दूरी बनाने का ऐलान भी कर दिया है। उन्होंने किसी भी कमेटी का हिस्सा बनने से भी इंकार कर दिया है। देखना यह है कि सिंधिया की नाराजगी कितनी दूर तक जाती है और यह क्या गुल खिलाती है। उनके समर्थकों द्वारा उन पर इस क्षेत्र को मुख्य धारा से जोड़े जाने का दबाव भी बढ़ता जा रहा है।
प्रदेश में लगातार हार से कांग्रेस इस समय हांसिए पर है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 230 में से महज 58 सीटें हासिल हुई थीं। इसलिए सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया मानते हैं कि 2018 का चुनाव कांग्रेस के लिए करो या मरो का संघर्ष है और जब तक कांगे्रस मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित नहीं करेगी तब तक प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने का उसका सपना पूरा नहीं होगा। श्री सिंधिया ने सीएम फैस की बात मुखरता से उठाई है, लेकिन कांग्रेस का यह सौभाग्य है या दुर्भाग्य इस दल में मुख्यमंत्री पद के महत्वाकांक्षी चेहरों की कमी नहीं है। इन दावेदारों का मानना है कि यदि कांगे्रस ने जन दबाव में मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया तो पलड़ा सिंधिया का भारी होगा, क्योंकि सिंधिया उम्र और छवि के मामले में सबसे अव्वल हैं। इसीलिये सीएम कैंडिडेट घोषित करने की बात न तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरूण यादव और न ही नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह कर रहे हैं। दोनों ने तो स्पष्ट रूप से कहा है कि कांगे्रस सामूहिक नेतृत्व के आधार पर चुनाव लड़ती रही है और कांग्रेस में कोई ऐसा क्षत्रप नहीं है जिसका पूरे प्रदेश में प्रभाव हो। सीएम कैंडिडेट घोषित नहीं हुआ तो प्रत्येक क्षत्रप अपने इलाके में कांग्रेस की जीत के लिए जुटेगा। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है और कमलनाथ यह कहकर बच रहे हैं कि कांगे्रस सामूहिक नेतृत्व के आधार पर चुनाव लड़े या मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करके, इसका निर्णय सोनिया गांधी और राहुल गांधी करेंगे। कमोबेश कांतिलाल भूरिया और प्रदेश कांग्रेस प्रभारी दीपक बावरिया की भी यही भाषा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता स्पष्ट रूप से राय व्यक्त करने के स्थान पर गेंद आलाकमान के पाले में भले ही डाल रहे हैं, लेकिन माना जा रहा है कि वह मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करने की खिलाफ में है। कहा जा सकता है कि इस मुहिम में ज्योतिरादित्य सिंधिया अलग-थलग पड़ गए हैं। सिंधिया ने पार्टी आलाकमान के समक्ष अपने जनाधार को दिखाने के लिए खूब पसीना बहाया है। अटेर, कोलारस और मुंगावली की जीत उनके खाते में है। पिछले एक साल से वह पूरी गंभीरता के साथ नेतृत्व की कमान संभालने के लिए प्रयास कर रहे हैं। जून 2017 में हुए किसान सम्मेलन के दौरान उन्होंने अपने आपको मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का विकल्प बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मंदसौर तक रोड़ शो करने के साथ उन्होंने किसानों के हित में सत्याग्रह भी किया था जिसके चलते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के समक्ष एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी, लेकिन इसके बाद भी उन्हें मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करने के लिए कांग्रेस आलाकमान में हिचक बनी हुई है। यह हिचक तब है जब सिंधिया राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के बेहद करीबी हैं। सिंधिया को चुनकर पाटी्र्र के अन्य वरिष्ठ नेताओं को नाराज करने का जोखिम लगता है राहुल गांधी नहीं ले पा रहे हैं। कहा जा सकता है कांगे्रस अपने पिछले अनुभवों से सीखने को तैयार नहीं है।
15 साल से सत्ता से दूर कांग्रेस को करना चाहिए नया प्रयोग?
प्रदेश मेंं कांग्रेस 2003 से सत्ता से बाहर है और हर चुनाव में उसकी स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है और अब तो ऐसे आसार नजर आ रहे हैं कि कांग्रेस की स्थिति उत्तरप्रदेश जैसी न हो जाए। जहां वह अपने दम पर सत्ता पाने की सोच भी नहीं सकती। कांग्रेस 2003 से ही सामूहिक नेतृत्व के आधार पर चुनाव लड़ती रही है तो क्यों न उसे इस चुनाव में मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर चुनाव लडऩे का जोखिम लेना चाहिए।
क्षेत्र को मुख्य धारा से जोडऩे के लिए स्व. सिंधिया हुए थे कांग्रेस में शामिल
सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता स्व. माधवराव सिंधिया की राजनीति में शुरूआत सन 1971 में जनसंघ से हुई थी और वह उस चुनाव में गुना लोकसभा क्षेत्र से विजयी हुए थे। सन 1980 में जब देश में कांग्रेस की लहर थी तब स्व. माधवराव सिंधिया अपने मूल दल को छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे और उन्होंने तर्क दिया था कि वह राजनीति में इलाके का विकास कराने की दृष्टि से हैं और राजनीति उनके लिए समाज सेवा का एक माध्यम है तथा कांग्रेस से बाहर जाने के कारण यह क्षेत्र मुख्य धारा से दूर चला गया है जिससे इसके विकास में पिछडऩे का खतरा है। सवाल अब यह है कि क्या कांग्रेस अब देश की मुख्य धारा में रही है। पहले अधिकांश प्रदेशों में काबिज कांग्रेस का सिर्फ दो प्रदेशों पंजाब और कर्नाटक में कब्जा है।






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