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हवा छेड़कर आंचल तेरा भाग गई,हम कितनी बार हवा से ऐसे ही हारे हैं

एड.हरिवल्लभ श्रीवास्तव के सम्मान में काव्यगोष्ठी आयोजित
शिवपुरी। रामकिशन सिघंल फाउंडेशन के तत्वावधान में कोलारस के अपने समय के सुप्रसिद्ध अभिभाषक और वर्तमान में जयपुर राजस्थान के प्रवासी हरिवल्लभ श्रीवास्तव के सम्मान में काव्यगोष्ठी का आयोजन दुर्गामठ में किया गया। वे गोष्ठी के मुख्य अतिथि थे। इसकी अध्यक्षता-डाॅ. लखनलाल खरे ने की तथा विषिष्ठ अतिथि के रूप में डाॅ. हरिप्रकाश जैन उपस्थित हुए। गोष्ठी का संचालन डाॅ. मुकेश अनुरागी के द्वारा किया गया। गोष्ठी में उपरोक्त के अलावा अरुण अपेक्षित, अशोक मोहिते, डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल, विनय प्रकाश जैन नीरव, शकील शिवानी नस्तर, राजकुमार श्रीवास्तव, संजय श्रीवास्तव, राजकुमार चैहान भारती, रामकृष्ण मोर्य, मो.याकूब साबिर, अखलाक खान, प्रकाषचन्द्र सेठ, रामपंडित, एसके अटारिया ने अपनी श्रेष्ठ रचनाओं का पाठ किया।
गोष्ठी के प्रारम्भ में रामकिशन सिघंल फाउंडेशन के संयोजक डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल, अरुण अपेक्षित और विनयप्रकाश नीरव ने मुख्य-आसंदी पर विराजे अतिथियों का पुष्पहार से स्वागत किया। डाॅ. मुकेश अनुरागी की सरस्वती वंदना के साथ गोष्ठी का शुभारंभ किया।
लगभग चार घंटे चली इस काव्यगोष्ठी में मुख्य-अतिथि हरिवल्लभ श्रीवास्तव ने अपनी अनेक रचनाओं का पाठ किया। उनकी एक श्रृंगारिक रचना की पंक्तियां थी-
हवा छेड़कर आंचल तेरा भाग गई,
हम कितनी बार हवा से ऐसे ही हारे हैं,
पायल ने चूम लिया पैरों को तेरे,
हम पायल की गुस्ताखी के मारे हैं।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे डाॅ. लखनलाल खरे ने जैन धर्म के जिओ और जीने दो और अहिंसा परमो धर्मा के विचार का संदेष देते हुए एक अत्यंत संवेदनशील, मार्मिक और हृदय स्पर्षी घटनात्मक कथात्मक रचना का पाठ किया।
सुप्रसिद्ध गीतकार डाॅ. हरिप्रकाश जैन ने श्रोताओं की मांग पर देश के वयोवृद्ध गीतकार सोमठाकुर के द्वारा प्रशंसित गीत के साथ एक सांप्रदायिक सम्भाव की स्थापना को समर्पित गजल भी पढ़ी। जिसका शेर है-
दुश्मनी की बर्फ को अब तो पिघलना चाहिए,
दोस्ती और अम्न की इक नीव रखना चाहिए।
वरिष्ठ कवि और कलाकार अरुण अपेक्षित ने अपनी दो मधुर तथा नवीन प्रतीकों में बंधी हुई गीतिकाओं की प्रस्तुति कुछ इस तरह की-
माना की तेरी आंखों में दियासिलाई है,
हमने अपने जीवन में खुद आग लगाई है।
इसके साथ ही-
हर जगह हर समय है अपेक्षित अरुण,
आप कितनी भी उसकी उपेक्षा करो।
छत्री अधिकारी अशोक मोहिते ने अपनी राजनैतिक व्यंगवाली रचना के साथ एक अन्य रचना में आत्मशक्ति से भरे शब्दों में कहा-
मैं अपनी जीत की ऊंची उड़ान रखता हूं,
साथ कदमों तले सारा आसमान रखता हूं,
आप आओगे तो जन्नत बना के रख लेंगे,
ये सोच कर अपना खाली मकान रखता हूं।
नवगीतकार विनय प्रकाश नीरव ने विकाष के साथ आने वाले स्वाभाविक विनाष की ओर इशारा करते हुए कहा-
कांक्रीट से गलियां पटी,
अब भला कैसे नहाए,
धूल में चिड़ियां।
नई गजल के सशक्त हस्ताक्षर डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल ने नई पीढ़ी से आग्रह किया-
गालिब नहीं है, मीर भी, दुष्यंत भी नहीं,
हम कर रहे हैं आप भी कोशिा तो कीजिए।
गोष्ठी के संचालक और नवगीतकार डाॅ. मुकेश अनुरागी सामाजिक विद्रूपताओं को सुधारने के आग्रह के साथ कहा-
अब न कभी उर झंकृत करते, मुख से निकले बोल,
अब तो इन्हें संभारो भैया, मन की आंखें खोल।
वरिष्ठ शायर शकील शिवानी नस्तर के मन के नस्तर की चुभन थी-
हम आषियाने बना रहे हैं,
वे आशियाने जला रहे हैं।
नई सोच और चिंतन से भरे हुये शायर याकूब साबिर की रचनाओं ने गोष्ठी में खूब प्रशंसाएं बटोरी-
तेरे सामने जब मौत खड़ी होगी,
उतर जाएगा सब नशा जिंदगी का।
गजलों के राजकुमार कहे जाने वाले कोलारस के कवि राजकुमार श्रीवास्तव ने पारिवारिक विघटन को उजागत करती हुई गजल का पाठ किया-
जब से आंगन में विवाद ने पैर पसारे हैं,
तरस रहे वंदनवारों को घर के द्वारे हैं।
मृत्यु जीवन का अटल सत्य है। इसी सत्य के साथ जुड़े हुये तथ्यों की रचना थी कोलारस से उपस्थित कवि संजय श्रीवास्तव की-
घर के चैवारे में सब चुपचाप बैठे हैं मगर,
इक दिया जलता रहा और याद वो आता रहा।
नई कविता के सषक्त कवि अखलाक खान ने धर्म और संप्रदाय के झगड़े के मध्य मानव के खोते जा रहे चैहरे की रचना का पाठ किया।
त्रिषूल और तलवार के बीच,
गुम हो गया है चैहरा,
पहचानना मुष्किल है,
इंसान कौन?
कवि प्रकाश चन्द्र सेठ की रचनायें विचारोत्तेजक होती है। उन्होंने कहा-
अब हम कलयुग से सतयुग की तरफ जा रहे हैं,
पर बीच में द्वापर और त्रेता आ रहे हैं।
हास्य और व्यंग के कवि रामपंडित ने कहा-
सीमाओं को अपनी लांघने लगे हैं,
सरपंच विधायक का टिकिट मांगने लगे हैं।
इसी हास्य रस के प्रभावी कवि राजकुमार चौहान भारती ने कभी प्राइमरी कक्षा की बालभारती पुस्तकों में संकलित रचना गांधी को कुछ इस तरह पढ़ा-
घोटाले पर घोटाले कर, खूब नाम कमाऊंगा,
माॅ खादी की चादर देदे, मैं नेता बन जाऊंगा।
वरिष्ठ कवि रामकृष्ण मोर्य की श्रृंगारिक रचनाओं ने पकी उम्र में किषोरावस्था का अनुभव करा दिया।
जख्मदिल बहुत यार गहरे हुए,
नाप सकता नहीं उनकी गहराईयां।
गोष्ठी के अंत में रामकिशन सिघंल फाउन्डेषन के संयोजक डाॅ. महेन्द्र ने सभी आगन्तुक कवियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
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