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वर्तमान सिंध की पाइप लाइन से नहीं मिल सकता शहरवासियों को पानी, अब सिंध जलावर्धन योजना के दोषियों पर होगी कार्यवाही!

शिवपुरी। 2009 से शुरू हुई सिंध जलावर्धन योजना भले ही 9 साल में पूर्ण नहीं हो पाई हो, लेकिन इतना अवश्य तय हो गया है कि मौजूदा पाइप लाइन के सहारे शहर में सिंध का पानी आना संभव नहीं है। घटिया पाइप लाइन पानी के प्रेशर का बोझ नहीं सह पा रही है और तीन में से एक पंप चलाने पर भी पाइप लाइन टूट रही है और जब तीन पंप चलाए जाएंगे तो स्थिति कितनी भयावह होगी यह समझा जा सकता है। तीन पंप न चलने के कारण टंकियों में भी पानी नहीं पहुंच पा रहा। ऐसी स्थिति में अब बिना कोई अगर मगर के सिंध जलावर्धन योजना के दोषियों के खिलाफ कार्यवाही के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यह ठीक से शासन और प्रशासन को समझ में आ गया कि यदि शहर की जनता को सिंध का पानी पिलाना है तो मौजूदा 35 किमी लंबी पाइप लाइन बदला जाना ही एक मात्र विकल्प है। इसके लिए कम से कम 10 करोड़ रूपए खर्च करना होंगे। जबकि 35 किमी घटिया पाइप लाइन दोशियान 20 करोड़ रूपए से अधिक की राशि नगरपालिका से ले चुकी है।
सिंध जलावर्धन योजना में यदि कर्ताधर्ताओं के इरादे नेक होते तो महज 65 करोड़ में पानी सात साल पहले ही घर-घर पहुंच गया होता। इस योजना में भ्रष्टाचार तो साफ नजर आ रहा है, लेकिन जो नजर नहीं आ रहा और जिसका अस्तित्व है वह है षडय़ंत्र जो इस शहर की जनता के साथ किया गया। इस महत्वाकांक्षी योजना में सबसे पहला अड़ंगा नेशनल पार्क के डायरेक्टर शरद गौड़ ने डाला। जिन्होंने वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन बताकर नगरपालिका को वन्य क्षेत्र में पाइप लाइन डालने की अनुमति को निरस्त कर दिया। यहीं से इस योजना में ग्रहण लगना शुरू हुआ। इसके बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय से वन्य क्षेत्र में खुदाई और पाइप लाइन डालने के लिए एक लंबी लड़ाई लडऩी पड़ी। योजना में विलंब के कारण प्रोजेक्ट महंगा हुआ और 65 करोड़ की यह योजना 110 करोड़ पर जा पहुंची। इस आपाधापी में योजना का कार्य गुणवत्तापूर्ण तरीके से हो रहा है अथवा नहीं इसे देखने की किसी ने चिंता नहीं की। तर्क यह दिया गया कि चूंकि दोशियान 25 साल तक योजना का काम देखेगी। शहर की जनता से जलकर वसूल कर उन्हें पानी पिलाएगी इसलिए वह क्यों घटिया काम करेगी। इस अनदेखी के कारण दोशियान और नगरपालिका के जिम्मेदारों के हौंसले बुलंद हुए। यही कारण रहा कि योजना में काम बेहद घटिया हुआ और घटिया स्तर के पाइप इस्तेमाल किए गए। जिन्हें देखकर नगरीय प्रशासन के ईएनसी कटारे ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे घटिया पाइप किसी भी नगरपालिका में पानी देने के लिए इस्तेमाल नहीं हुए। दोशियान ने बताया जाता है कि 77 लाख 50 हजार रूपए प्रति किमी की दर से 35 किमी घटिया पाइप डालकर 20 करोड़ रूपए से अधिक का भुगतान प्राप्त कर लिया है। डूब क्षेत्र में दोशियान ने लोहे के स्थान पर प्लास्टिक के पाइप इस्तेमाल किए। इन दिनों डूब क्षेत्र में पानी नहीं है और लीकेज होने पर पाइपों को सुधारा जाना भी संभव हुआ है, लेकिन जब डूब क्षेत्र में पानी भर आएगा और उस समय पाइप लीकेज हुए तो शहर की जनता को कैसे पानी मिलेगा यह जिम्मेदारों ने नहीं सोचा। नगरपालिका के अधिकारी दोशियान के इतने प्रेशर में थे कि सिंध जलावर्धन योजना का अनुबंध शिवपुरी के स्थान पर कंपनी ने अहमदाबाद में कराया जहां नगरपालिका के अधिकारियों को हवाई यात्रा कंपनी ने कराई तथा उनका शाही खर्चा उठाया। इसके एवज में किसी ने अनुबंध नहीं देखा। अनुबंध इंग्लिश में था और उसका हिंदी रूपांतरण करने अथवा उसका अर्थ समझने का किसी ने कष्ट नहीं उठाया। योजना में जब एक बार भ्रष्टाचार शुरू हुआ तो फिर भ्रष्टाचार का सिलसिला लगातार बढ़ता गया।

तीन नपाध्यक्ष और आधा दर्जन से अधिक सीएमओ बदले, लेकिन किसी ने नहीं उठाई घटिया कार्य पर ऊंगली

पूर्व नपाध्यक्ष जगमोहन सिंह सेंगर के कार्यकाल से योजना प्रारंभ हुई और उनके बाद रिशिका अष्ठाना, मुन्नालाल कुशवाह नगरपालिका अध्यक्ष बने। जहां तक मुख्य नगरपालिका अधिकारी का सवाल है तो योजना के क्रियान्वयन के दौरान रामनिवास शर्मा से लेकर, पीके द्विवेदी, कमलेश नारायण शर्मा, श्री रावत, सुरेश रैवाल, रणवीर कुमार सहित अनेक सीएमओ आए और गए, लेकिन किसी ने भी घटिया कार्य पर ऊंगली नहीं उठाई। नगरपालिका की ओर से उपयंत्री गुप्ता और उपयंत्री मिश्रा पर सिंध जलावर्धन योजना के निरीक्षण का जिम्मा था, लेकिन जिम्मेदारों ने भ्रष्टाचार में सहभागिता के अलावा किया क्या? प्रत्येक ने इस योजना को भ्रष्टाचार का एक माध्यम समझकर उसमें अपने हाथ गीले किए। जिसके परिणामस्वरूप सिंध जलावर्धन योजना का आज यह हश्र हुआ है। 

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