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कांग्रेस की चौसर में चाणक्य जैसी चतुराई: एक तीर से कई निशाने


अतुल उपाध्याय शिवपुरी- मध्यप्रदेश की सत्ता की लडाई के
लिये बिछाई गई कांग्रेस की चौसर में चाणक्य जैसी चतुराई दिखाते हुए जिस तरह मोहरों की जमावट की गई है, उसमें एक तीर से कई निशाने लगाये गये हैं. इस  तरह की हुनरमंद निशानेबाजी करना किसी नौसिखिये राजनीतिक निशानेबाज के बूते के बाहर है लिहाजा मध्यप्रदेश में कांग्रेस की राजनीति की गहरी समझ रखने वाले बिश्लेषकों नें यह जान लिया है कि इस पूरे खेल का एकमात्र अनुभवी खिलाडी.कौन है…
राजनीति के खेल में पूर्ण-पारंगत हुए बिना स्वयं को खिलाडी. ही नहीं बल्कि विजेता मान लेने की गलतियों का खामियाजा कैसे भुगतना पड.ता है , ये बात कोई उनसे पूछे जो किसी राजनीतिक स्वप्नदोष का शिकार होकर स्वयं को मुख्यमंत्री का प्रत्याशी ही नहीं बल्कि भविष्य का मुख्यमंत्री ही मान बैठे थे. अब बेचारे बंधुआ मजदूरी करेंगे. फल मिला तो कोई दूसरा खायेगा , नही मिला तो इन्हें गरियाया जायेगा.
यदि ऐसे कई प्यादों को जिन्होंने राजनीति की चौसर पर तीन चार घरों में ही कदमपोशी की हो और पांच घरों को फांदकर सीधा आठवें घर में डालकर प्यादों से ऊंट , घोडा. या हाथी जैसे महत्व का मोहरा बना दिया जाये तो प्यादे भले ही गलतफहमी में रहें कि वे खास मोहरे हैं पर दरअसल उनकी हैसियत प्यादों से अलहदा कुछ होती नहीं है. वे कहने को तो हाथी , घोडा. या ऊंट होते हैं पर हकीकत के आईने में उनका कद किसी दूसरे छोटे प्यादे जैसा ही होता है.

मुख्यमंत्री बनने के लिये हिलोरें मार रही आकांक्षाओं की फिलहाल राजनीतिक भ्रूण हत्या हो गयी है

बहरहाल इस बिश्लेषण को ध्यान से पढने वाले ये आसानी से समझ जायेंगे कि  मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने 2018 के चुनावी समर के लिये अपनी फौज की जो पहली जमावट की है उसमें निश्चत ही किसी चाणक्य जैसी तीक्ष्ण बुद्धि समान दिग्विजयी व्यक्ति का बनाया मजबूत चक्रव्यूह है. इस चक्रव्यूह जिसमें से युद्ध की विजय या पराजय के बाद वही व्यक्ति साबुत बाहर निकल सकेगा जो राजनीति के साम ,दाम,दंड,भेद विद्या का पूर्ण पारंगत होने के अलावा स्वयं भी ऐसा पराक्रमी योद्धा होगा जिसके सामने कोई रथी-महारथी भी सामान्य रूप से ठहर न सके.कुछ ऐसे महत्वपूर्ण मोहरे हैं जिन्हें इस चक्रव्यूह में फंसना तो दूर घुसने से भी बचाया गया है.
कांग्रेस के सबसे बडे.खिलाडी.आलाकमान यानि राहुल गांधी के निर्देशानुसार जिस तरह कांग्रेस के महासचिव अशोक गहलोत ने मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष की आसंदी पर कमलनाथ को गद्दीनशीन कर दिया कल्पना से परे पूर्व हो गये प्रदेशाध्यक्ष एक ही झटके में वहीं पहुँच गये जहां से सफर शुरू हुआ था. ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव प्रचार समिति का मुखिया बनाकर युद्ध में महारथी का मुकुट लगाकर लडने की पूरी छूट दे दी गई है लेकिन जीत या हार की स्थिति में तमाशबीन बना देने की गारंटी को गई है. ज्योतिरादित्य की भीतर से मुख्यमंत्री बनने के लिये हिलोरें मार रही आकांक्षाओं की राजनीतिक भ्रूण हत्या हो गयी है.

अब रही बात प्यादों को मोहरा बनाने की तो ये बात सच ही है कि जिन चार कांग्रेसी महानुभवों को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर प्यादों से सीधे मोहरा बनाने की कबायद की गई हे उससे इस चौसर के असली खिलाडी. की ही स्थिति मजबूत होती है. जैसे जीतू पटवारी , बाला बच्चन , सुरेन्द्र चौधरी और रामनिवास रावत को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के दो मायने हैं , एक तो इनमें से कोई भी मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष न तो कोई था और न कोई रहेगा. परन्तु ये सब अपने-अपने प्रभाव वाले जिलों में अपना दम-खम दिखाने पर मजबूर होंगे. इससे नवनियुक्त वयोवृद्ध प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ को थोडा आराम भी रहेगा. दूसरे चार अध्यक्षों के रहते महाराज संबोधित किये जाने वाले ज्योतिरादित्य का राजनीतिक कद जीतू पटवारी अथवा उनके जैसे तीन अन्य कार्यकारी अध्यक्षों के इर्द-गिर्द ही रहेगा. मसला साफ है कि यहां बिना पानी दिये महाराज को उनकी राजनीतिक हैसियत दिखा दी गई है. इस पर तीसरी तुर्रा यह है संपूर्ण टिकट वितरण और अति संवेदनशील मामलों पर प्रदेशाध्यक्ष और अनुभवी वरिष्ठ नेता होने के नाते कमलनाथ के स्वतंत्र नियंत्रण को नकारा महीं जा सकेगा.

हाई कमान की नजर में कमलनाथ ही क्यों……

लगातार कई चुनावों में हारकर कंगाल हो चुकी कांग्रेस के पास आज सबसे ज्यादा धन की कमी है. दानदाताओं और चंदा देने वाले हाथ लुप्त हो चुके हैं. संगठन कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा की तमाम ईमानदार कोशिशों के बाद भी दल के पास धन की बहुत कमी है. उद्योगपति और 2014 तक लगातार सत्ता और कांग्रेस की शिखर राजनीति के निकट कमलनाथ ही ऐसा चेहरा रहे हैं जो मध्यप्रदेश में कांग्रेस की वापिसी के लिये आवश्यक धन-संसाधनों से युक्त स्वच्छ छवि के नेता हैं जिनपर पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी भी विश्वास कर सकती हैं. इनके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को कांग्रेस का चेहरा बनाया जा सकता था लेकिन उन्होंने पहले ही साफ कर दिया कि वे न तो स्वयं चुनाव लडे.गे र न ही मुख्यमंत्री की दौड. में रहेंगे लिहाजा वर्तमान संदर्भों में आलाकमान के विश्वसनीय के रूप में कमलनाथ को हरी झंडी मिल गई.

इस पूरी कवायद का  राजनीतिक मतलब निकालने से पहले गौर करिये कि क्या अरूण यादव को कहीं का नहीं छोडा. गया तो ऐसा मानने वालों के लिये किसी भी प्रकार की रोक नहीं है. अरूण यादव को अति महत्वाकांक्षी जानकर हाईकमान ने उनका कद तो कम किया ही है. लेकिन अरूण का गुस्सा कांग्रेस के लिये नकारात्मक हो सकता है. लेकिन महासचिव अशोक गहलोत के द्वारा जारी पत्र में नाम नहीं होने के वावजूद नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ,  नेता सुरेश पचौरी , नेता मुकेश नायक, विधायक जयवर्धन सिंह, युवा नेता राजकुमार पटेल समेत अनेक नाम ऐसे हैं जो आश्वस्त हैं कि भविष्य में कांग्रेस सरकार बनने पर उनकी अनदेखी नहीं की जायेगी. और इसी प्रकार की सकारात्मकता के बूते ही कांग्रेस चुनावी समर में बेहतर प्रदर्शन कर सकेगी वरना कमलनाथ राज्यभर से कमल के वजूद को कितना मिटा सकेंगे यह तो देखने वाली बात ही होगी

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