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स्कूल फीस न देने पर बच्चे का नाम काट सकता है स्कूल: दिल्ली हाई कोर्ट

माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 27 मई 2022 को डब्ल्यू.पी.(सी) 8466/2022 मास्टर दिव्यम भटेजा बनाम स्कूल के मामले में ऐतिहासिक आदेश पारित किया। दिल्ली स्कूल शिक्षा नियम 1973 के नियम 35 और 167 स्कूल को भुगतान के लिए अंतिम दिन के बाद 20 दिनों के लिए फीस और अन्य बकाया राशि का भुगतान न करने पर बच्चे का नाम काटने की शक्ति देते हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम ‘2009 के लागू होने के बाद उपर्युक्त रिट याचिका में इन नियमों पर सवाल उठाया गया था। साथ ही, एचसी के आदेश ने इस मुद्दे पर प्रकाश डाला कि क्या उपर्युक्त नियम किशोर की धारा 75 के प्रावधानों के विपरीत हैं। जस्टिस केयर एंड प्रोटेक्शन एक्ट, 2015। माननीय डिवीजन बेंच ने यह स्पष्ट कर दिया कि एक निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल के खिलाफ आरटीई को बिना शर्त लागू नहीं किया जा सकता है। याचिकाकर्ता सरकारी स्कूल में प्रवेश लेने के लिए स्वतंत्र है यदि वह निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूल की फीस का भुगतान नहीं कर सकता है। साथ ही, किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की उक्त धारा 75 और दिल्ली स्कूल शिक्षा नियम, 1973 के लागू नियम 35 और 167 के बीच कोई विरोध नहीं है।
इस आदेश से दिल्ली के निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूलों को बड़ी राहत मिली है। यह देखा गया है कि कई माता-पिता ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 का अनुचित लाभ उठाने की यह प्रथा शुरू कर दी है। साथ ही माता-पिता के प्रति सरकार के नरम रवैये ने कुछ बेईमान लोगों को सहारा दिया है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि बिना सहायता प्राप्त स्कूल पूरी तरह से माता-पिता द्वारा एकत्र की गई फीस पर निर्भर करता है। यदि स्कूल को शुल्क के संग्रह में भारी पेंडेंसी का सामना करना पड़ता है तो स्कूल की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। स्कूल में भारी मात्रा में ओवरहेड खर्च होता है जो शुल्क संग्रह पर निर्भर करता है। एनएसएसओ सर्वेक्षण 2019 कहता है कि हमारे देश में 80 प्रतिशत स्कूल 1000 रुपये प्रति माह से कम शुल्क पर चल रहे हैं। फीस पेंडेंसी जमा फीस से ज्यादा होने पर इन स्कूलों को बंद कर दिया जाएगा। अत: हम माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के इस आदेश का स्वागत करते हैं।

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