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शिक्षा के अधिकार को मुंह चिढ़ाती हकीकत: ‘लाड़ो’ कागजों में कर रहीं पढ़ाई, कीचड़ में तलाश रही कबाड़

शिवपुरी। निकिता और निशा का नाम तो स्कूल में दर्ज है, वह कागजों में शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत शिक्षा भी ग्रहण कर रही हैं, लेकिन इस कागजी शिक्षा की धरातलीय हकीकत यह है कि वह कभी स्कूल गई ही नहीं हैं। वह तो हर रोज सुबह से ही रूपयों के लिए कबाड़ की तलाश में निकल आती हैं ताकि घर में दो जून की रोटी की व्यवस्था हो सके। यह वो सच्चाई है जो ऐसी न जाने कितनी निकिता और निशा की है। इन्हें शिक्षा का अधिकार मिला है लेकिन सिर्फ कागजों में।
दरअसल रविवार को कब्रिस्तान रोड पर कीचड़ के बीच तीन छोटी-छोटी बच्चियां कबाड़ तलाश रही थीं। इन बच्चियों ने अपने नाम निकिता, निशा निवासी महल सराय बताया। उनसे जब यह जानने का प्रयास किया कि वह क्या कर रही हैं? तो बच्चियों ने बेझिझक बताया कि वह कबाड़ बीन रही हैं और पैसों के लिए वह कबाड़ बीनने के लिए आती हैं। बच्चियों के अनुसार उनका नाम स्कूल में लिखा तो है, लेकिन वह कभी स्कूल जाती नहीं हैं क्योंकि उनके पास पहनने के लिए न तो ढंग के कपड़े हैं और न ही ड्रेस। शहर में ऐसे ही दर्जनों बच्चे हैं जो कागजों में तो पढ़ाई कर रहे हैं लेकिन हकीकत में वह कभी स्कूल गए ही नहीं होते हैं। उन्हें सिर्फ कागजों में ही शिक्षा का अधिकारी दिया जा रहा होता है। यहां बताना होगा कि पूर्व के वर्षों में चाइल्ड लाइन ने ऐसे कई बच्चों और उनके माता-पिता की काउंसलिंग भी की थी, ताकि वह पढ़ाई और समाज की मुख्य धारा से जुड़ सकें।

इनका कहना है
-हमने हाल ही में होटल पर काम करने वाले बच्चों के मामले में अभियान चलाया था। इनमें से श्रम विभाग ने दो पर तो एफआईआर भी करवाई थी। इसी तरह नवग्रह मंदिर पर भीख मांगने वाले बच्चों को लेकर भी हमने कार्रवाई की। हम ऐसे बच्चों के मामले में भी जल्द ही कार्रवाई करेंगे जो कागजों में तो स्कूल जाते हैं लेकिन वास्तविकता में कचरा आदि बीन रहे हैं। इस मामले में हम नियमानुसार वैधानिक कार्रवाई करवाएंगे।
सुषमा पांडे
अध्यक्ष, सीडब्ल्यूसी

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