Press "Enter" to skip to content

अपनी वाणी मे शक्कर जैसी मिठास लाना चाहिये मुनि श्री विशोक सागर जी

खनियॉधाना :- खनियाधाना नगर में विराजमान गणाचार्य श्री108 विराग सागर जी महाराज के शिष्य  श्री विशोक सागर जी महाराज द्वारा ज्ञान गंगा की धारा निरंतर प्रातः 8:30 बजे श्री1008 पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर में हो रही है। प. जुगल किशोर मुख्तार द्वारा रचित मेरी भावना में भरे हुये रस को समाज में परोसते हुये मुनि श्री ने कहा कि इस मेरी भावना के माध्यम से पंडित जी ने जैन धर्म का सिद्धांत को जन जन तक पहुँचाया है। क्रोध मान माया लोभ इन चार कषायों के दमन बिनामुनि या साधु बनने का सार प्राप्त नहीं होता है। आज कल के प्रभाव से मुनि के भी इन चार चौकडी कषाय का सर्ब था अभाव नहीं है लेकिन मुनि ज्यादा से ज्यादा कर्म उदय से आने वाले क्रोध माया लोभ से 1 अन्तर्मुहूर्त मैं अपने आप को आजमा सकते हैं। श्रावक को भी साधु संगति  के माध्यम से उनकी चर्या अनुरूप समान दमन करना चाहिए। इन क्रोध मान माया लोभ चार कसायो के सद्भाव मैं जीवन पतन की ओर ही जाता है।ज्ञान कही से भी प्राप्त हो हमे प्राप्त करना चाहिए ज्ञानार्जन बिना अहंकार मान  के त्याग दिए बिना प्राप्तहोना संभव नहीं है शिष्य  को गुरु के नीचे बैठना पड़ेगा  अगर बाल्टी मे जल भरना है तो उसे नल के ऊपर नहीं नीचे ही रखना पड़ेगा बीज को पोधा एवं पेड़ बनने के लिए अपना विस्तार करने के भूमि मे समर्पित होना पड़ेगा उसे भूमि मे झुकना पड़ेगा हमे अपनी वाणी (बोली ) मे शक्कर की मिठास लाना है नीबू की खटास नहीं शक्कर का दाना चींटियों को जोड़ता है लेकिन नीबू का रस दूध को फाड़ता  है आज सुई का काम करने वाले समाज मे वहुत है लेकिन केची का काम करने वाले वहुत मिल जायेगें दूसरों को नुकसान पहुचाने वाला नीबू पहले कटता है निचुड़ता  है इसके बाद फेंक दिया जाता है दूसरों के लिए हाथ मे अंगारा लेकर फेककर मरने पर हमारा स्वयं का हाथ तो निश्चित जलेगा ही जिसे मारा जा रहा हे वह निशाना चूकने से स्थान बदलने से भी बच सकता हे। उसी प्रकार दूसरों के प्रति खोटा विचार लाने पर हमे तो खोटे कर्म का बंध तो हो ही गया जिसके प्रति हमने बुरा करने का भाव किया या  उसका क्रियान्वय  किया  वह अपने  कर्मों दय  से बच भी सकता है !

More from Fast SamacharMore posts in Fast Samachar »

Be First to Comment

Leave a Reply

error: Content is protected !!