खनियांधाना – रक्षा बंधन पर्व केवल बहिन द्वारा भाई की कलाई पर राखी बंधना या मिठाई खिलाना भाई द्वारा बहिनां को उपहार देना ही नहीं वरन् इसका बहुत विस्तृत रूप है उक्त उदगार भक्त कि श्री विरागसागर जी गणाचार्य के शिष्य प्रखर भक्ता श्रमण 108 श्री विशोक सागर जी मुनिराज ने उल्लेखनीय है कि श्री 1008 पार्वनाथ दिगम्वर जैन बडा मंदिर जी में मुनि श्री का बर्षाकाल धर्ममय वातावरण मे सम्पन्न हो रहा है प्रतिदिन मेरी भावना पर मंगल प्रवचन एंव धार्मिक अनुष्ठान चल रहे है इसी क्रम मे भगवान श्रेयांसनाथ का मोक्ष कल्याणक एंव वात्सल्य पर्व रक्षा बंधन पर निर्माण लाडू एंव रक्षा बंधन विधान बडे़ ही भक्तिमय वातावरण मे सम्पन्न हुआ। इस अवसर श्री पूज्य मुनि श्री ने भगवान तीर्थंकार श्रेयांसनाथ के जन्मकल्याणक से मोक्ष कल्याणक तक के जीवन व्रृतांत का वर्णन किया एंव जैन शासन मे रक्षा बंधन क्यो मनाया जाता है इस पर भी धर्म चर्चा की पूज्य मुनि श्री ने कहा कि रक्षा बंधन पर्व पर हमें इस राखी को केवल सुन्दरता इसके बांधने के तरीके पर खुश होते है लेकिन कभी इस रक्षा सूत्र को समझने का प्रयास नही किया प्रत्येक नागरिक का कृतव्य है कि हम आज के दिन इस रक्षा सूत्र को बांधकर कर देश की, धर्म की, समाज की, पडोसी की, पत्नी की, पति की, बेटा की, मॉ-बाप की रक्षा करने का संकल्प ले यह वात्सल्य का पर्व है सभी भाई चारे से रहे प्राणी माल को भी हमारे द्वारा कष्ट ना हो हमारे बोलने से चलने फिरने से अन्य आवस्पक क्रियाओं से किसी भी प्राणी का अहित न हो उसे किसी भी प्रकार का दुख न पहुचे यह पूज्य मुनि श्री ने कहा की हमे यह मानव जीवन बडी मुस्किल से प्राप्त होता है यह मानव जीवन स्व परिकल्याण के लिये मिला।
आये थे हरि भजन को ओरन लगे कपास यह स्थिति हमारी हो गई है।






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