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स्वार्थ का त्यागी ही धर्म मार्ग पर चल सकता है। – श्री विषोक सागर जी महाराज

खनियाधाना – खनियांधाना नगर मे विराजमान गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज जी के परम शिष्य ओजस्वी  बक्ता 108 मुनि श्री विषोक सागर जी महाराज एवं 108 मुनि श्री विघेय सागर जी महाराज जी का वर्षा योग श्री 1008 पार्ष्वनाथ दिगम्बर जैन बडा मंदिर जी में चल रहा है । मुनि श्री विशोक सागर जी महाराज जी के द्वारा नगर मे ज्ञान की गंगा बहाई जा रही है। जगत के लोग आपको फूल मालाओं लाद ते है तो कभी  मौका आता है सडे टमाटर भी  फेके जाते है। संसार के प्राणी हमे कितन ही सम्मान देने का वादा करे या अपमान होने की धमकी .धन देने का प्रकोभन दे या धन हरने का प्रयास अभय दान देने का संकल्प ले या मृत्यु डण्ड देने की धौंस लेकिन फिर भी  ज्ञानी जन न्याय मार्ग से विचलित नही होते है। उनकी एक भावना होती है भगवान से कि हे भगवन कितनी ही अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थियों मे मेरे द्वारा धर्म प्रतिकूल मार्ग का प्रवतन न हो। यह उद्गार परम पूज्य मुनि श्री विशोक सागर जी महाराज जी ने  जैन धर्म का सार जुगल किशोर मुख्तार द्वारा रचित मेरी भावना के व्याख्यान माला मे उद्घारित किया। पूज्य मुनि श्री ने कहा कि ज्ञानी जन का चिन्तन कर्म सिद्धान्त का चलता है बह विचार करता है सुख दु:ख , जीवन मरण , हानी लाभ सब मेरे पूर्व कृत का धनी है। पूज्य मुनि श्री ने उदाहरणार्थ बताया कि नारियल इतना कठोर एंव धनत्व बाला है कि उसे सागर मे डुवाने पर भी उसके अन्दर एक भी बूंद पानी का प्रवेश भी  नही कराया जा सकता जब बह पेड पर जमीन से 25से 30 फुट पर लगा होता है जहा वगैर संसाधन के पानी पहुचाना असम्भव है जरा सोचो कि नारियल मे पानी कैसे भरा होता है। और हरे नारियल मे पानी पहुचने का श्रोत क्षीर गोचर नही उसी प्रकार पुण्य के उदय मे धन वैभव आने के श्रोतो का हस्तिपात नही होता जब पाप का उदय आता है। बैसे ही सब धन सम्पत्ती बिलीन हो जाती है। मुनि श्री कहते है कि जब सब कुछ मेरे पाप पुण्य के उदय से मिलने बिछुडने बाला है तो ज्ञानी  चिन्ता  किसी बात की करेगा। ज्ञानी  पुरुष नि:शंक एंव नि:कांक्षित  होकर स्वं एंव पर कल्याण के लिये सदैव साबधान एंव प्रयत्नशील रहकर अपना जीवन जीता है।

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