खनियाधाना। नगर मे आचार्य श्री विराग सागर जी के परम प्रभाकर शिष्य मुनि श्री विशोक सागर जी एवं मुनि श्री विधेय सागर जी का वर्षाकालीन चातुर्मास चल रहा है इस बीच मुनि श्री के सानिध्य में श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर जी में प्रातः कालीन विशेष प्रवचन श्रंखला में मुनि श्री विशोक सागर महाराज जी ने विजय दशमी का महत्व बताते हुए कहा कि अध्यात्म धर्म पर्व त्यौहार व मेले हमारी भारतीय संस्कृति व सामाजिक मान्यताओं के अभिन्न अंग है हमारी सभी मुख्य पर्वो व त्योहारों का संबंध हमारे अवतारों व महापुरुषों से है। हमारी संस्क्रति मे धर्म,सत्य पवित्र आचरण व न्याय को प्रधानता दी है। जवकी असत्य व अधर्म के आचरण से दूर रहने को कहा गया है। इतिहास गवाह है कि जब-जब अधर्म अहंकार व असत्य ने अपना प्रमुख कायम करने चेष्टा की है तब-तब अधर्म पर सत्य की स्थापना व रक्षा हेतु सृष्टि पालनहार ने अवतार लिया है विजयदशमी अपने नाम के अनुरूप ही विजयोत्सव है। अधर्म पर धर्म की विजय का ,चाहे बह रावण पर राम की विजय नेता युग में जब महापराक्रमी व महाज्ञानी रावण ने चारों ओर त्राहि-त्राहि मचा दी तब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र मैं इस घर को लंकेश के अत्याचारों से बचाया तथा धर्म व सत्य की स्थापना की। अहंकार व अधर्म के पतन व सत्य व धर्म की स्थापना का यह पावन पर्व है विजयादशमी। अश्विन माह में शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाले इस पर्व के मुख्य नायक व खलनायक दोनों एक ही राशि के हैं। दोनों के मध्य में ज्ञान का अपार भंडार है दोनों परमवीर है दोनों शिव भक्त हैं लेकिन इन विशेषताओं के मध्य, दोनों में बहुत सी असमानताएं हैं श्रीरामचंद्र जहां धर्म सत्य मर्यादा व न्याय की सीमा है वही रावण मर्यादाहीन अधर्मी अन्यायी व असत्य का आचरण करने वाला है।
जहां प्रभु राम में धीरता, वीरता संयम विनय शांति व सरलता सरीखे गुण हैं। वहीं रावण में अहंकार दुष्टता का छल कूट कूट कर भरा है । श्रीराम में पितृ भक्ति कूट-कूट कर भरी है जब माता कैकई ने श्री राम के लिए 14 वर्ष का वनवास की शर्त राजा दशरथ से मनवाई तो श्रीराम ने पिता के वचन की लाज रखने हेतु बिना संकोच का विरोध के सहर्ष वनगमन स्वीकार कर लिया पिता की सेवा व उनकी आज्ञा श्रीराम के लिए सर्वोपरि है माता केकई के प्रति उनका स्नेह व आदर भी पूर्व की तरह ही कायम रहा पिता के वचनों के पालन के लिए शहडोल माता केकई को दंडवत प्रणाम करके वनवास जाते समय यह कहा माता मैं आपका ऋणी है। धन्यवादी हूं आपने मुझे पिता के वचनों को पूर्ण करने का सौभाग्य उपलब्ध कराया गुरू आज्ञा व सेवा श्री राम के स्वभाव में शामिल रहे है। शरण में आए को श्री राम ने सदैव आश्रय दिया चाहे वह सुग्रीव हो या शत्रु के भ्राता विभीषण विजय दश्मी कस पर्व राम की रावण पर विजय का पर्व है सीता माता को रावण की कैद से मुक्त करवाने हेतु श्री राम ने रावण से युद्व किया महा पराक्रमी रावण का वध सरल नहीं था यह राम ही कर सकते थे रावण का वध दश्मी तिथि को हुआ
मर्यादाओं के अंर्तगत कई वार युद्व से पहले रावण को धर्म मार्ग पर लाने के लिये कभी विभीषण को कुभंकर्ण के पास भेजकर युद्ध को टालने के अनथक प्रयास किये अंततः अधर्म पर धर्म को विजय बनाने के लिये दस सिर वाले रावण का सहार करके दशहरा को उत्सव के रूप में मनाने का मानव जाति को उपहार के साथ साथ ज्ञानवर्धक अवसर प्रदान किया ताकि प्रतिबर्ष जनमानस यह शिक्षा स्मरण रख सके । विजय दश्मी का पर्व वास्तव में प्रतीक है अधर्म,असत्य, व अन्याय पर धर्म, सत्य व न्याय की जीत की।






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