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वात्सल्य बिना धर्मात्मा की शोभा नहीं होती।  मुनि श्री विशोक सागर जी 

खनियाधाना :–  खनियाधाना के 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन बडे मंदिर जी मे विराजमान मुनि श्री विशोक सागर जी मुनिराज , मुनि श्री विधेय सागर जी मुनिराज के सानिध्य मे चल रहे सिध्दचक्र विधान मे शनिवार को श्रद्धालुओं ने भगवान की पूजा अर्चना करते हुए 1024 अ‌र्घ्य चढ़ाते हुए मंगल की कामना की। शनिवार को कार्यक्रम का शुभारंभ नित्य नियम भगवान की पूजन-अर्चना व जलाभिषेक व शांति धारा के साथ किया गया। इसके उपरांत मंत्रित जल व पीली सरसों से विधानस्थल के शुद्धिकरण की क्रियाएं हुई। विधानचार्या पं. श्री अरविन्द जी जैन ने मंत्रोचार से सिद्धचक्र विधान का पूजन किया गया। श्रद्धालुओं ने शिध्य भगवान की पूजन कर  अ‌र्घ्य समर्पित करते हुए विश्व कल्याण व शांति की कामना की मुनि श्री विशोक सागर जी महाराज जी ने प्रवचन मे कहा कि वत्सलता’ या स्नेहपूर्ण भावों की अभिव्यक्ति करने वाला रस वात्सल्य रस कहलाता है | निःस्वार्थ  प्रेम से ही समाज , देश एवं राष्ट्र की एकता कायम रह सकती हैं वात्सल्य ,स्नेह ,प्रेम ही संगठन का अमोघ साधन है। जिस समाज ,देश एवं राष्ट्र के वासियों में परस्पर में वात्सल्य, स्नेह ,प्रेम होता है उस समाज ,देश,राष्ट में नियम से संगठन होता है । जिस प्रकार नाक बिना चेहरे की शोभा नहीं होती ,चेहरे विना सुन्दर शरीर की शोभा नहीं होती ,ठीक वैसे ही वात्सल्य बिना धर्मात्मा की शोभा नहीं होती वात्सल्य ,धर्मात्मा का श्रृंगार है । जहां वात्सल्य प्रेम है वहां स्वर्ग है।लोक व्यवहार में स्वार्थ पूर्ण प्रेम हो सकता है किन्तु धर्म में स्वार्थ पूर्ण प्रेम नहीं होता ।यदि धर्म नीति में स्वार्थ पूर्ण प्रेम ,स्नेह आने लग जाये तो वह वात्सल्य ,स्नेह ,प्रेम धर्म को प्राप्त नहीं हो सकता। वात्सल्य रत्न धर्मात्मा को कहा जाता है, अधर्मात्मा को नहीं। वात्सल्य परिचय नहीं मागता ,परिचय में स्वार्थ जाग्रत हो सकता है।धर्मात्मा का निःस्वार्थ वात्सल्य होता है। 

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