शिवपुरी। लम्बे समय तक नशा कर अपनी सामाजिक जिंदगी, धन और स्वास्थ्य को होम कर चुके युवा अब इस बुराई से दूर होकर समाज को नशा मुक्त बनाने की राह पर कदम बढ़ा चुके हैं। उनकी संस्था का नाम ही है एडिक्शन फ्री इंडिया। वह कहते हैं कि यदि हमारे प्रयासों से एक युवा भी नशे से बाहर निकल आया तो हमारी जिंदगी सार्थक होगी और जो कुछ हमने खोया है वह काफी हद तक हम पाने में सफल रहेंगे। इंदौर से आए इन सात युवाओं का नेतृत्व मूल रूप से तिब्बत निवासी 38 वर्षीय डोरजी कर रहे हैं जिनका कहना है कि नशेलची प्रताडऩा का नहीं बल्कि दया का पात्र है। शुरू-शुरू में नशा वह भले ही मजे के लिए करता हो, लेकिन बाद में वह लत का शिकार हो जाता है और उसका पूरा शरीर तथा मन नशे की मांग करता है जिसके आगे वह बेवश रहता है। वह कहते हैं कि नशे से ग्रस्त व्यक्ति को किसी एंगल से देखकर उसका इलाज किया जाना चाहिए, क्योंकि जिसे हम शराबी नशेड़ी, गंजेड़ी, भंगेड़ी और ड्रग एडिक्ट कहते हैं वह हमारे अपमान, तिरस्कार और जिल्लत का हकदार नहीं है। वह बीमार होता है और उसके साथ बीमार व्यक्ति की तरह संवेदनशील व्यवहार किया जाना चाहिए।
देश के विभिन्न भागों में सेमिनारों के जरिए देश को नशा मुक्त बनाने की राह पर निकल पड़े युवाओं की टीम में डोरजी के अलावा उत्सव गोयल, उत्सव चतुर्वेदी, देवांश सिंह, कपिल नारसरिया, हर्ष वर्मा और रविकांत दुबे शामिल हैं। ये वे युवा हैं जो 10-10-15-15-20-20 साल से नशा कर अपना सब कुछ गवां चुके हैं। उनके और उनके परिवार के सारे सपने चूर-चूर हो चुके हैं। नशे के कारण दो युवाओं के तलाक भी हो चुके हैं। डोरजी कहते हैं कि मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसी तिरस्कृत जिंदगी के बाद एक सुखद बदलाव आएगा, लेकिन इंदौर के एक नशा मुक्ति पुनर्वास केंद्र ने मेरे जीवन की दशा बदल दी और जिंदगी फिर से पटरी पर आ गई। इसके बाद से मैंने इंदौर के नवचेतना नशा मुक्ति केंद्र में काउंसलर की हैसियत से काम करना शुरू किया। वह कैसे लोगों को नशा मुक्त कराते हैं इसके बारे में जानकारी देते हुए डोरजी ने बताया कि नशा एक लत और आदत होती है तथा इस आदत से मुक्ति के लिए आवश्यक है कि लत को दूसरी सकारात्मक और रचनात्मक दिशा में मोड़ दिया जाए। इसके साथ ही उनमें नशे से दूर करने की दृढ़ इच्छा शक्ति पैदा की जाती है ताकि उनकी मानसिकता बदल सके। सुबह उठते से ही योग और व्यायाम कराए जाते हैं यहां तक कि घर की साफ सफाई झाड़ू आदि भी लगवाई जाती है। कठोर और अनुशासित जीवनशैली को उनके जीवन का एक अनिवार्य अंग बनाया जाता है जिसके परिणामस्वरूप दो-तीन माह में नशे की बुराई से व्यक्ति बाहर निकल आता है। अब डोरजी के साथ वे युवा भी जुड़ गए हैं जो उनके प्रयासों से नशे से दूर हो चुके हैं।
मिलिए एडिक्शन फ्री इंडिया के युवाओं से
डोरजी- 38 वर्षीय डोरजी बताते हैं कि वह 13 साल से नशा कर रहे थे। संसार का कोई भी ऐसा नशा नहीं है जो उन्होंने नहीं किया हो। बीड़ी, सिगरेट, शराब, गांजा, चरस, अफीम और भांग से लेकर नशे की गोलियां और इंजेक्शन उनकी लत में शामिल था। नशे से दूर करने के लिए घर वालों ने शादी करा दी, लेकिन शादी से नशे से मुक्ति तो नहीं मिली, लेकिन नशे के कारण तलाक अवश्य हो गया। 15 साल नशे के बाद जब घर का सबकुछ खत्म हो गया। धन और स्वास्थ्य के साथ-साथ सामाजिक जिंदगी तबाह हो गई तो किसी तरह परिवार वालों ने उन्हें बैंगलोर के पुनर्वास केंद्र में भेजा और जहां से न केवल वह नशे से मुक्त हुए बल्कि उनके जीवन की राह बदल गई। पिछले 10 साल से वह अनेक लोगों को इस बीमारी से मुक्ति दिला चुके हैं।
उत्सव गोयल- 30 वर्षीय उत्सव गोयल देवास के रहने वाले हैं। वह इंजीनियर हैं। वह बताते हैं कि स्कूली जीवन से ही उन्होंने शराब पीना शुरू कर दिया था। इस कारण इंजीनियरिंग में भी वह कई बार अनुर्तीण हुए। नशे के कारण नौकरी उन्हें नहीं मिली और कहीं मिली तो उन्हें निकाल दिया गया। शराब की आदत ने उनके घर का सोना-चांदी सबकुछ बिकवा दिया। परिवार वालों को अलग मेरे कारण अपमानित होना पड़ा। पिछले डेढ़ साल से फैमिली ने मुझे पुनर्वास केंद्र में भेजा और डोरजी की मेहनत से आज मैं नशे से मुक्त हूं तथा उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा हूं।
हर्ष वर्मा (मांडू)- 23 वर्षीय हर्ष वर्मा बताते हैं कि पिछले 10 सालों से 13 वर्ष की उम्र से वह नशा कर रहे हैं। नशे के कारण उन्हें इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोडऩी पड़ी और नशे ने उनके बचपने को छीन लिया। नशे की गोलियां और इंजेक्शन में वह परम आनंद महसूस करते थे, लेकिन अब डोरजी ने मुझे इस नशे से मुक्त करा दिया है और मैं ग्राफिक डिजाइनर का काम कर रहा हूं तथा सामाजिक रूप से उनके साथ जुड़ा हुआ हूं।
रविकांत दुबे (महू)- 36 वर्षीय रवि 18 साल से नशा कर रहे हैं। माता पिता दोनों डॉक्टर हैं। घर में समृद्धि की कमी नहीं है, लेकिन उनके नशे के कारण पूरे परिवार की शांति तबाह हो गई थी। कई बार नशा छोडऩा चाहा, लेकिन छोड़ नहीं पाया, लेकिन अब पूरी तरह से नशा छोड़ चुका हूं और अब दूसरों के जीवन को संवारने का प्रयास कर रहा हूं।
देवंाश (शहडोल)- 30 वर्षीय देवांश बताते हैं कि 20 साल की उम्र में जब वह पढऩे के लिए भोपाल आए तो हॉस्टल में उनके साथ रहने वाले छात्र नशा करते थे। कई दिनों तक मैंने उनका साथ नहीं दिया, लेकिन अंतत: उन्हीं से नशे की प्रेरणा मिली और एक महीने के भीतर ही मैं एक डेढ़ बोतल शराब रोज पीने लगा। जमा पूंजी बर्बाद हो गई। घर वाले त्रस्त हो गए। अंतत: डोरजी ने मेरी जिंदगी की सवारी और अब मैंने अपनी जिंदगी की डोर भी उनके हाथ में सौंप दी है।
कपिल नारसरिया (इंदौर)- 40 वर्षीय कपिल 11 वर्ष से नशा कर रहे थे। उनका कहना है कि मैंने हर तरह का नशा किया है और नशे के कारण ही उनका तलाक भी हो चुका है, लेकिन पुनर्वास केंद्र के प्रयासों से वह नशे से दूर हुए और आज डोरजी के साथ समाज को नशा मुक्त बनाने का संदेश दे रहे हैं।
उत्सव चतुर्वेदी (इंदौर)- 41 वर्षीय उत्सव चतुर्वेदी शतरंज के नेशनल प्लेयर रह चुके हैं। वह कहते हैं कि उन्होंने वर्ष 1996 से नशा प्रारंभ किया। बचपन अवश्य उनका नशामुक्त रहा, लेकिन 20 वर्ष की उम्र में मित्रों की प्रेरणा से वह नशेलची बन गए, लेकिन अब डोरजी ने उन्हें पूरी तरह नशा मुक्त कर दिया और अब वह अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन करने में जुटे हुए हैं।





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