सिंध जलावर्धन योजना को पलीता लगाने के लिए जिम्मेदार कौन?
शिवपुरी। सिंध जलावर्धन योजना जिसके लिए शहर का हर नागरिक 7 साल से बेताबी से इंतजार कर रहा है उसके तहत सिंध नदी का पानी शिवपुरी आने के आसार निरंतर कम होते जा रहे हैं। यह स्थिति इसलिए बनी, क्योंकि शुरू से ही सिंध जलावर्धन योजना का काम गुणवत्तापूर्ण तरीके से नहीं हुआ और इस पर न तो शासन न ही प्रशासन और न ही जनप्रतिनिधियों ने कभी आपत्ति उठाई। मीडिया ने समय-समय पर घटिया कार्य को निशाने पर लिया, लेकिन यह कहकर पल्ला झाड़ लिया गया कि काम तो हो जाने दो गलत काम हुआ है तो बाद में दोशियान से निपट लेंगे। इसका परिणाम यह हुआ कि दोशियान के हौंसले बुलंद होते गए और इस योजना के माध्यम से सरकारी खजाने की लूट खसोट करना ही उसने अपना मुख्य मकसद बना लिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि तीन माह के लंबे समय के बाद भी पाइप लाइन को लीकेज मुक्त नहीं किया जा सका और अब तो स्थिती इतनी बदतर है कि आशावादी से आशावादी व्यक्ति पर भी अब निराशा हावी होने लगी है। नपाध्यक्ष मुन्नालाल कुशवाह ताल ठोककर जहां पहले कहते थे कि वह शिवपुरीवासियों को सिंध का पानी जल्द से जल्द पिलाएंगे अब उनकी भाषा भी नकारात्मक दिशा में मुड़ गई है। वह स्वीकार करते हैं कि यह योजना समाप्त होने के कगार पर है और मुझे आशा नहीं है कि सिंध का पानी शिवपुरी आएगा। नगरपालिका उपाध्यक्ष अन्नी शर्मा की भाषा भी लगभग यही है। सवाल यह है कि सिंध जलावर्धन योजना को पलीता लगाने के लिए जिम्मेदार कौन हैं और क्या जिम्मेदारों के खिलाफ कार्यवाही नहीं होनी चाहिए।
शिवपुरी के लोग वर्षों से चांदपाटे का मलमूत्र युक्त पानी पी रहे हैं और जब सिंध जलावर्धन योजना मंजूर हुई तो इसका शहरवासियों ने स्वागत किया। 2009 में इस योजना का कार्य प्रारंभ हुआ और आशा थी कि 2011 तक सिंध का पानी लोगों के घरों तक पहुंच जाएगा। इस योजना में सबसे बड़ी भूल क्रियान्वयन एजेंसी चुनने में हुई। उस दोशियान कंपनी को काम दिया गया जिसका रिकॉर्ड कभी अच्छा नहीं रहा। दोशियान कंपनी ने प्रोजेक्ट हैड गैर तकनीकी व्यक्ति को बनाया। नगरपालिका ने भी योजना में ठीक ढंग से मॉनिटरिंग नहीं की और न ही किसी विशेषज्ञ को सुपर विजन का काम सौंपा गया। शासन प्रशासन और राजनेताओं ने भी काम की मॉनिटरिंग में दिलचस्पी नहीं ली। जिसका परिणाम यह हुआ कि शुरू से ही दोशियाना के हौंसले बुलंद हो गए। उसे उसकी मनमानी करने के लिए खुला छोड़ दिया गया। पाइप लाइन डालने का कार्य गैर जिम्मेदारी से किया गया। सीमेंट और बजरी से सैट करने के स्थान पर पाइप लाइन को मिट्टी से सैट किया गया। इस खुलेआम भ्रष्टाचार को जब मीडिया ने उठाया और इसकी ओर ध्यान आकर्षित किया गया तो मीडिया को यह कहकर चुप करा दिया गया शहर की पहली आवश्यकता योजना के क्रियान्वयन की है और दोशियान ने यदि गड़बड़ी की है तो उससे बाद में निपट लेंगे। इसी बीच वन विभाग के अधिकारी ने नियमों के उल्लंघन की आड़ लेकर नेशनल पार्क क्षेत्र में सिंध जलावर्धन के काम को रोक दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि दोशियान ने पूरी तरह काम बंद कर दिया। यदि यह कंपनी अपने कार्य के प्रति ईमानदार होती तो उसके स्थान पर नेशनल पार्क क्षेत्र से अन्यथा योजना का कार्य किया जा सकता था। पाइप लाइन डाली जा सकती थी और टंकियों का निर्माण किया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। बड़ा सवाल यह भी है कि वन विभाग के एक अदने से अधिकारी में इतनी हिम्मत कैसे आ गई कि जनहित की इस योजना को उसने पलक झपकते ही बंद करा दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में दो साल से अधिक समय लग गया। बाद में जब हरी झंडी मिली तो दोशियान ने योजना का बजट बढ़ाकर पेश कर दिया और यह भी किया गया, लेकिन फिर भी पानी आने में लगातार दोशियान द्वारा विलंब किया जाता है। तीन माह पहले जब बायपास पर सिंध का पानी आया तो शिवपुरीवासियों की खुशियों का कोई अंत नहीं था। शहर में ऐतिहासिक जलाभिषेक यात्रा निकली और ऐसा लगा कि दिल्ली अब ज्यादा दूर नहीं है। लेकिन तीन माह में सिंध का पानी घर-घर तक तो नहीं आया, परंतु यह एहसास अवश्य होने लगा है कि सिंध का पानी शिवपुरी आना सिर्फ चमत्कार की स्थिति में ही संभव है। चमत्कार नहीं हुआ तो सवाल यह है कि क्या दोशियान के खिलाफ शासन और प्रशासन एफआईआर दर्ज कराएगा।






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