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राजनीतिक कैरियर की शुरूआत में खेली चमत्कारिक पारी को दुबारा नहीं दोहरा सकीं यशोधरा राजे, क्या 2018 में….?

जिले की पांच सीटों पर 1989 के चुनाव में हुए करिश्मे को फिर दोहरा पाएंगी यशोधरा राजे 

शिवपुरी। सन 1989 में वरिष्ठ भाजपा नेत्री कैबिनेट मंत्री और शिवपुरी विधायक यशोधरा राजे सिंधिया ने शिवपुरी को कर्मस्थली मानकर अपनी राजनीति की शुरूआत की थी तब से अब तक उनके नेतृत्व में जिले में 6 चुनाव हो चुके हैं इनमें से सबसे पहले चुनाव 1989 में उन्होंने भाजपा के खाते में पांचों सीटें डालने में सफलता हासिल की थी और इसके पहले दो चुनावों में 5-0 की बढ़त प्राप्त करने वाली कांग्रेस को एक भी सीट हासिल नहीं हो पाई थी। इसके बाद इस करिश्मे को यशोधरा राजे सिंधिया कभी नहीं दोहरा पाई। 2008 में अवश्य भाजपा ने पांच में से चार सीटें जीती और कांग्रेस महज एक सीट पर सिमट गई थी। देखना यह है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा क्या 1989 के चमत्कार को करने में सफल होगी अथवा नहीं।
1989 के विधानसभा चुनाव में यशोधरा राजे सिंधिया अचानक राजनीति में आईं। उस समय भाजपा ने पहले विनोद गर्ग टोड़ू की शिवपुरी विधानसभा से उम्मीदवारी घोषित की और बाद में उनका टिकट काटकर स्व. सुशील बहादुर अष्ठाना को उम्मीदवार बनाया गया था, लेकिन तब तक भाजपा का अधिकृत चुनाव चिन्ह कलेक्टर ने स्व. विनोद गर्ग टोड़ू को आवंटित कर दिया था। ऐसे में राजमाता विजयाराजे सिंधिया के समक्ष बड़ी परीक्षा थी कि वह भाजपा के अधिकृत चिन्ह के खिलाफ कैसे वोट मांगे। इससे बचने हेतु उन्होंने चुनाव में न आने का निर्णय लिया और कमान राजनीति से अंजान यशोधरा राजे सिंधिया को सौंपी। यशोधरा राजे सिंधिया ने पांचों विधानसभा क्षेत्र में पूरी मेहनत की। जिसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी सुशील बहादुर अष्ठाना तो जीते ही। कोलारस से ओमप्रकाश खटीक, करैरा से स्व. भगवत सिंह यादव, पोहरी से स्व. जगदीश वर्मा और पिछोर से लक्ष्मीनारायण गुप्ता को विजयश्री हासिल हुई। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी और लक्ष्मीनारायण गुप्ता राजस्व मंत्री बनाए गए। इसके बाद 1993 के विधानसभा चुनाव में यशोधरा राजे स्वयं चुनाव मैदान में नहीं उतरी और उन्होंने अपने विश्वस्त सिपहसालार देवेंद्र जैन को शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया। अन्य चार विधानसभा क्षेत्रों में भी उन्होंने मेहनत की, लेकिन भाजपा उनकी मेहनत के बावजूद महज दो सीटों पर सिमट गई। शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र से देवेंद्र जैन और कोलारस से ओमप्रकाश खटीक जीते जबकि कांग्रेस ने करैरा, पोहरी और पिछोर से जीत हासिल की। यहां से क्रमश: करण सिंह रावत, बैजयंती वर्मा और केपी सिंह विजयी हुए। सन 1998 के विधानसभा चुनाव में यशोधरा राजे सिंधिया स्वयं शिवपुरी से चुनाव मैदान में उतरी और जिले की शेष चारों सीटों पर उम्मीदवार चुनने के लिए उन्हें फ्री हैण्ड मिला। लेकिन भाजपा शिवपुरी, करैरा और पोहरी सीट ही जीत पाई। यहां से भाजपा की उम्मीदवार यशोधरा राजे, रणवीर रावत और प्रहलाद भारती चुनाव जीते। जबकि कांगे्रस ने कोलारस और पिछोर सीट पर कब्जा प्राप्त किया। कोलारस से स्व. पूरन सिंह बेडिय़ा और पिछोर केपी सिंंह विजयी हुए। 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को फिर झटका लगा और जिले की पांच सीटों में से वह महज दो सीटें ही जीत पाईं। भाजपा ने शिवपुरी और कोलारस से जीत हासिल की। शिवपुरी से यशोधरा राजे सिंधिया और कोलारस से ओमप्रकाश खटीक चुनाव जीते। कांग्रेस को सिर्फ एक विधानसभा सीट पिछोर से जीत हासिल हुई। जहां उसके उम्मीदवार केपी सिंह लगातार तीसरी बार विजयी होने में सफल हुए। पोहरी सीट से समानता दल के उम्मीदवार हरिवल्लभ शुक्ला जीते वहीं जिले की राजनीति में पहली बार बसपा ने करैरा विधानसभा सीट जीती जहां से लाखन सिंह बघेल ने कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों को पराजित कर सभी राजनैतिक समीक्षकों को चौंका दिया। 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 1989 के चुनाव के बाद फिर एक बड़ी सफलता हासिल की जब तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भाजपा पांच में से चार विधानसभा सीटों पर जीतने में सफल रही। शिवपुरी से माखनलाल राठोर, पाहरी प्रहलाद भारती, कोलारस से देवेंद्र जैन, करैरा से रमेश खटीक चुनाव जीते जबकि पिछोर सीट पर लगातार चौथी बार कांग्रेस के केपी सिंह का कब्जा रहा। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सीटों की संख्या घटकर आधी रह गई और पांच में से भाजपा महज दो सीटें शिवपुरी और पोहरी जीत पाई इनमें से शिवपुरी में यशोधरा राजे के कारण भाजपा को जीत हासिल हुई जबकि पोहरी में उनके अनुयायी प्रहलाद भारती चुनाव जीते। कांग्रेस तीन सीटों पर सफल रही। कोलारस से स्व. रामसिंह यादव, करैरा से शकुंतला खटीक और पिछोर से केपी सिंह चुनाव जीते। इसके बाद कोलारस उपचुनाव में भी कांग्रेस का कोलारस सीट पर कब्जा बरकरार रहा। 
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