विधायक भारती के टिकिट को काटने के लिए एक सशक्त खेमा प्रयासरत
पिछले दो विधानसभा चुनाव से ब्राह्मण उम्मीद्वार पर कांग्रेस ने लगाए असफल दांव

शिवपुरी। शिवपुरी जिले की पांच विधानसभा सीटों में से कांग्रेस और भाजपा के बीच सबसे कड़ा मुकाबला इस बार पोहरी विधानसभा क्षेत्र में देखने को मिल सकता है। कांग्रेस इस विधानसभा क्षेत्र से लगातार दो चुनावों से पराजित हो रही है और इस बार जीतने के लक्ष्य को ध्यान में रखकर वह मुकाबले में उतरने की तैयारी कर रही है। सूत्र बताते हैं कि पोहरी विधानसभा क्षेत्र में जीतने की खास रणनीति सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के लिए तैयार कर रहे हैं। पोहरी विधानसभा क्षेत्र में इस बार भाजपा के लिए भी रास्ता आसान नहीं है। यहां से भाजपा उम्मीद्वार प्रहलाद भारती लगातार दो विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। वह पहले ऐसे विधायक हैं जिन्होंने पोहरी से लगातार दो चुनाव जीतने का श्रेय प्राप्त किया है, लेकिन इसके बावजूद भी इस बार उनकी राह कांग्र्रेस द्वारा पूरी ताकत फूंक देने के बावजूद आसान नहीं है और दूसरे भाजपा में एक सशक्त खेमा उनका टिकट काटने के लिए पूरा जोर लगा रहा है। लोकसभा चुनाव में पोहरी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा की हार को उनके खाते में पार्टी में उनके विरोधी जोड़ रहे हैं। इस कारण 2018 के विधानसभा चुनाव में पोहरी का गणित कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के लिए पूरी तरह खुला हुआ है।
पोहरी में विधायक प्रहलाद भारती का सबल पक्ष यह है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और यशोधरा राजे सिंधिया उनकी पैरवीकार हैं। विधायक भारती की छवि भी दो बार जीतने के बावजूद उतनी खराब नहीं है कि उस आधार पर उनका टिकट काट दिया जाए, लेकिन उन्हें खतरा हो सकता है तो केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर की सशक्त लॉबी से। श्री तोमर गुट यहां से सलोनी धाकड़ अथवा किसान भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रणवीर सिंह रावत की उम्मीद्वारी के लिए प्रयासरत हैं। उधर पूर्व मुख्यमंत्री उमाभारती के निकटस्थ पोहरी के पूर्व विधायक नरेन्द्र बिरथरे भी उम्मीद्वारी की इच्छा मन में पाले हुए हैं। उन्हें 1998 में पोहरी से यशोधरा राजे की कृपा से टिकट मिला था और वह कांग्रेस की उम्मीद्वार उस समय की विधायक बैजन्ती वर्मा को हराकर विजयी हुए थे, लेकिन 2003 के विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र बिरथरे पोहरी से बुरी तरह पराजित हुए थे और उन्हें समानता दल के हरिबल्लभ शुक्ला ने पराजित किया था। श्री बिरथरे उस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे थे। उमाभारती के पार्टी छोड़ने के बाद नरेन्द्र बिरथरे की राजनैतिक हैसियत भी कम हुई, लेकिन अब उमाभारती के भाजपा में आने और केन्द्रीय मंत्री बनने से नरेन्द्र बिरथरे भी टिकट की दौड़ में प्रमुखता से शामिल हो गए हैं। इससे स्पष्ट है कि भाजपा में भी अभी एक राय नहीं है कि उम्मीद्वार धाकड़ जाति का होगा अथवा ब्राह्मण या किसी अन्य वर्ग का। भाजपा टिकट की दौड़ में मण्डी कमेटी के उपाध्यक्ष कैलाश कुशवाह भी पूरी ताकत से लगे हुए हैं। शिवपुरी विधायक और प्रदेश सरकार की मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया के विधायक प्रतिनिधि कपिल जैन भी उनके साथ नजर आ रहे हैं। हालांकि यशोधरा राजे स्पष्ट रूप से श्री कुशवाह की उम्मीद्वारी के खिलाफ है। जबकि दूसरी ओर कांग्रेस की रणनीति पिछले दो चुनावों की तरह भाजपा के फैसले पर केन्द्रित है। 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में जब भाजपा ने धाकड़ उम्मीद्वार प्रहलाद भारती को टिकट दिया तो कांग्रेस ने 2008 में एनपी शर्मा और 2013 में हरिबल्लभ शुक्ला को मैदान में उतारा। 2008 में भी हरिबल्लभ पोहरी से चुनाव लड़े थे, लेकिन वह उस समय बहुजन समाज पार्टी के उम्मीद्वार थे इसके बावजूद उन्होंने उस चुनाव में कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेलते हुए दूसरा स्थान प्राप्त किया था। श्री शुक्ला पोहरी विधानसभा क्षेत्र से लगातार दो बार चुनाव हारे हैं और उनके प्रभाव के बावजूद यह आंकड़ा उनके टिकट की राह में रोडा बन सकता है।

ब्राह्मण उम्मीदवारों में आलोक के नाम पर कांग्रेस कर सकती है विचार
उम्र का फैक्टर भी श्री शुक्ला के खिलाफ है हालांकि ऐसी स्थिति में वह अपने युवा पुत्र आलोक शुक्ला का नाम भी आगे बढ़ा सकते हैं। श्री शुक्ला का नकारात्मक पक्ष यह भी है कि पोहरी के अधिसंख्यक कांग्रेस कार्यकर्ता उनके साथ नहीं है और गुटबाजी इस हद तक है कि दोनों गुट भाजपा को कम और अपने सहयोगी को अधिक दुश्मन मानते हैं। इसके बावजूद भी ब्राह्मण उम्मीद्वार पर यदि कांग्रेस ने विचार किया तो श्री शुक्ला के नाम पर प्रमुखता से विचार होगा।
टिकिट की दौड़ में नेताओं की लंबी फहरिस्त, कांग्रेस रहेगी असमंजस में
2008 के विधानसभा चुनाव में पराजित एनपी शर्मा भी टिकट की दौड़ में हैं और हरिबल्लभ विरोधी गुट उनके नाम को आगे बढ़ा रहा है। यह गुट धाकड़ उम्मीद्वार के रूप में किसान कांग्रेस के जिलाध्यक्ष सुरेश राठखेड़ा को भी प्रोजेक्ट करने पर तुला हुआ है। इस गुट के नेता केशव सिंह तोमर भी उम्मीद्वारी की दौड़ में शामिल हैं और राजेन्द्र पिपलौदा का भी अपना दावा है। हालांकि वह कर्मचारी नेता हैं और चुनाव लड़ने के लिए उन्हें अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देना पड़ेगा। उनके नाम पर कितनी गंभीरता से विचार होता है यह देखने वाली बात है। 1993 के चुनाव में कांग्रेस के विद्रोही उम्मीद्वार के रूप में तथा पार्टी का अधिकृत चुनाव चिन्ह लेकर आए देवव्रत शर्मा भी टिकट मांग रहे हैं वह वरिष्ठ कांग्रेसी नेता रहे स्व. गौतम शर्मा के सुपुत्र और पूर्व विधायक हिमांशु शर्मा के भाई हैं। कांग्रेस में उन्हें दिग्गी खेमे का माना जाता है, लेकिन उनकी उम्मीद्वारी की संभावना उतनी उज्जवल नजर नहीं आ रही। अपने आपको गुटबाजी से अलग दिखाने वाले युवा नेता विनोद धाकड़ एडवोकेट भी टिकट की मांग कर रहे हैं। अवतार सिंह गुर्जर जैसे युवा उनके नाम को आगे बढ़ा रहे हैं। वहीं युवक कांग्रेस की ओर से पूर्व युवक कांग्रेस अध्यक्ष विजय शर्मा भी टिकट की दौड़ में हैं। श्री शर्मा की ऊपरी स्तर पर पकड़ अच्छी बताई जाती है और सिंधिया से भी उनका अच्छा समन्वय है। इस तरह से पोहरी विधानसभा क्षेत्र में इस बार चुनाव से पहले उम्मीद्वारी की दौड़ में दोनों दलों कांग्रेस और भाजपा में जबर्दस्त संघर्ष होने के आसार नजर आ रहे हैं।







Be First to Comment