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शिवपुरीः 96.9 फीसद मामलों में बच्चों के परिचित होते है यौन अपराधीः डॉ. चौबे / Shivpuri News

शिवपुरी। चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की 38वी
ई-संगोष्ठी को पाक्सो एक्ट की बारीकियों और व्यवहारगत परेशानियों पर हुई।
इसें देश भर के बाल अधिकार कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। बाल
अधिकार विशेषज्ञ कविता भंडारी ने कहा कि पाक्सो अधिनियम में जोड़े गए नए
प्रावधान यौन अपराधों से बचपन को समग्रता से सुरक्षित करने की गारंटी देते
है, लेकिन समाज और जबाबदेह तंत्र को भी अपनी भूमिका का निर्वहन पूरी
संवेदनशीलता के साथ किये जाने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि यह
कानून शब्दकोशीय परिभाषा में शामिल बालक के सर्वोत्तम हित के साथ उसकी
पहचान को उच्च प्राथमिकता पर संरक्षित करता है। एक बालक जब यौन हिंसा का
शिकार होता है, तब वह शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, आर्थिक और जन्मजात
प्रतिभा के स्तर पर भी बुरी तरह से टूट चुका होता है। इसलिए ऐसे मामलों में
सभी स्टेकहोल्डर्स को गहरी मानवीय औऱ बाल सुलभ मानसिकता के साथ काम करने
की आवश्यकता होती है। पुनर्वास में बाल कल्याण समितियों की महती भूमिका को
रेखांकित करते हुए कहा कि धारा 19 के तहत खुद संज्ञान लेने से लेकर घटनाओं
की रिपोर्टिंग, प्रतिकर और भरणपोषण व्यवस्था जैसे मामलों में समितियों को
अतिशय सक्रियता के साथ अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए।

चाइल्ड
कंजर्वेशन फाउंडेशन के सचिव डॉ कृपाशंकर चौबे ने बाल शोषण से जुड़े प्रमुख
वैश्विक अध्ययन साझा करते हुए बताया कि आस्ट्रेलिया में 21.5 फीसद
बालिकाएं, अफ्रीका में 19.3 फीसदी बालक यौन अपराध के शिकार होते है। भारत
मे 53.22 फीसदी बालकों साथ एक या अधिक बार जीवन मे यौन दुर्व्यवहार का
शिकार होना पड़ता है। वर्ष 2018 तक 109 बालक रोजाना ऐसे मामलों के शिकार
होते है और यह आंकड़ा 22 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। डॉ. चौबे के अनुसार,
96.9 फीसद मामलों में लैंगिक अपराध करने वाले कोई न कोई परिचित जन शामिल
होता है। संगोष्ठी में किशोर न्याय अधिनियम 2015 में हालिया संसद में
प्रस्तावित संशोधन प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई।

 

रस्तावित संशोधन डीएम को प्रदान करता है असीमित अधिकार

ग्वालियर
के पूर्व सीडब्ल्यूसी अध्यक्ष डॉ. केके दीक्षित ने संशोधन प्रस्तावों पर
असहमति दर्ज कराते हुए कहा कि एडाप्शन और सुनवाई के मामलों में प्रस्तावित
संशोधन डीएम को असीमित अधिकार प्रदान करते है जिनके कानून बनते ही डीएम की
आड़ में कलेक्टर की कार्य संस्कृति जेजे एक्ट पर हावी हो जाएगी। कटनी के
पूर्व अध्यक्ष राकेश अग्रवाल ने एडाप्शन के मामलों में डीएम को दिए जाने
वाले अधिकारों के साथ बालकों की खरीद फरोख्त की प्रक्रियागत संभावनाओ को
रेखांकित किया। उज्जैन के अध्यक्ष लोकेंद्र शर्मा ने प्रस्तावित संशोधन में
संज्ञेय अपराधों की सुस्पष्ट परिभाषा का स्वागत किया। एडवोकेट रूपसिंह ने
विभिन्ना संशोधनों के विधिक पक्ष को साझा किया। मुरैना के जेजेबी सदस्य
राकेश शिवहरे का स्पष्ट मत था कि नए संशोधन प्रस्ताव जेजे एक्ट औऱ खासतौर
से सीडब्ल्यूसी के अधिकार को अतिक्रमित करते है और इन्हें स्वीकार नही किया
जाना चाहिए। फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. राघवेंद्र शर्मा ने संगोष्ठी में आए
सुझावों को शासन स्तर तक पहुंचाने का भरोसा दिलाते हुए ई-संगोष्ठी के
नवाचार को एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया।

 

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