
केदार सिंह गोलिया
शिवपुरी। कहते हैं राजनीति लोगों की नीयत और नियति दोनों को बदल देती है और सिद्धांतों पर भारी पड़ती है। ऐसा ही कुछ जिले के एक युवा पर लागू होता है जिसने समाजसेवा के रास्ते राजनीति में पर्दापण किया और समाजसेवक रहते हुए भाजपा का दामन थामा और उसके सिद्धांतों पर चलने की हुंकार भरी लेकिन जब जिस युवा को भाजपा में अपना राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध होता नजर नहीं आया तो उसने समाजसेवा और पार्टी की आस्थाओं को तिलांजलि दे डाली।
हम बात कर रहे हैं शिवपुरी मंडी के उपाध्यक्ष कैलाश कुशवाह जिन्होंने समाजसेवा के रास्ते सक्रिय राजनीति में पदार्पण किया और भाजपा का दामन था और वे घुर यशोधरानिष्ठों में शुमार भी हो गए, लेकिन इस विधानसभा चुनावों में पुन: जब भाजपा से अपनी जमीन हासिल होते नहीं दिखी तो पलभर में उन्होंने अपनी राजनैतिक आस्थाओं को खूंटी पर टांग दिया। कैलाश अब भाजपा के कैलाश नहीं रहे वे इस बार के चुनाव में कमल का साथ छोड़कर हाथी की सवारी करते नजर आएंगे क्योंकि कैलाश ने यशोधरानिष्ठ माने जाने वाले दो बार से पोहरी विधायक रहे प्रहलाद भारती के खिलाफ ही दलित वोट बैंक की राजनीति करने वाली बसपा का दामन थाम लिया और वे पोहरी विधानसभा सीट बसपा के प्रत्याशी भी घोषित कर दिए गए हैं। यहां भी राजनैतिक महत्वाकांक्षा कैलाश की इस सोच में झलक रही है क्योंकि यहां पोहरी क्षेत्र में करीब 25 हजार मतदाता कुशवाह समाज के आते हैं और कैलाश इस वोट बैंक को जातिगत आधार पर अपना मानकर चल रहे हैं। इसके अलावा बसपा का परंपरागत वोट बैंक भी एकाएक परिवर्तित आस्थाओं के बाद भी कैलाश इसे अपने पक्ष में मान बैठे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि समाजसेवा के रास्ते स्वार्थ की राजनीति के चलते चंद दिनों में कमल को छोड़कर हाथी की सवारी करने वाले कैलाश की यह रणनीति उन्हें विधायक की कुर्सी तक पहुंचाएगी या फिर उनका यह निर्णय चंद दिनों के उनके राजनीतिक कैरियर पर हमेशा के लिए फुलस्टॉप लगा देगी।






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