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पढ़िये, वरिष्ठ साहित्यकार एवं क्रांतिकारी लेखक *सुधा राजे* (सीनियर एडमिनिस्ट्रेशन ऑफिसर,लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी ,फगवाड़ा, पंजाब) द्वारा लिखी गई ग़ज़ल

१-सोच के देखो जला गाँव घर कैसा लगता है ,
मरता नहीँ परिंदा बे पर कैसा लगता है।
२-जिन को कोई डरा नहीं पाया वो राही जब,
मार दिये गये मंज़िल पर डर कैसा लगता है ।
३-आदमखोर छिपे बस्ती में,अपने अपने घर ,
काँप रहे अपनों से थर थर कैसा लगता है ।
४-अभी शाम को ही तो कंघी चोटी कर भेजी ,
नुची हुयी चुनरी पे जंफर कैसा लगता है ।
५-इश्क़ मुहब्बत प्यार वफ़ा की लाश पेङ पर थी,
श्यामी का फाँसी लटका वर कैसा लगता है ।
६-चुन चुन कर सामान बाँध कर रो रो विदा किया ,
जली डोलियों पर वो जेवर कैसा लगता है ।
७-बाबुल का सपना थी वो इक माँ की चुनरी थी ।
शबे तख़्त हैवान वो शौहर कैसा लगता है ।
८-छोटे बच्चे आये बचाने माँ जब घायल थी ।
वालिद के हाथों वो खंज़र कैसा लगता है ।
९-जिसके होने भर का ही अहसास डराता हो ,
बाँह गले में डाले अजगर कैसा लगता है ।
१०-जर्रे जर्रे पर बचपन की यादें छपी हुयीं ,
हके दुख़तरी छिना  वो शहर कैसा लगता है ।
११-इंक़लाब के इश्क़ भरे नग़मे लिखने वाला ,
जख़्मी तन्हा कैद में शायर कैसा लगता है  ।
१२-बाबा फाँसी चढ़े पिता सीमा पर मारे गए ,
बच्चे हैं मोहताज़ ये मंज़र कैसा लगता है ।
१३-राज किया सातों सागर के सीने पर जिसने ,
वो जहाज डूबा है पोखर  कैसा लगता है ।
१४-‘सुधा’ कहानी कब थी उसकी सुनी गुनी जानी,
मरने पर बेकफन बदन सर कैसा लगता है ।
*सुधा राजे*
सीनियर एडमिनिस्ट्रेशन आॅफिसर
लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी
फगवाड़ा
पंजाब

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