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सांस्कृतिक विस्मृति से समाज में बढ़ रहे हैं अपराधः जस्टिस पारे / Shivpuri News

 
शिवपुरी। समाज में निरंतर होता सांस्कृतिक क्षरण एक खतरनाक चुनौती है। अपराध का बढ़ता ग्राफ या पारिवारिक, सामाजिक तनाव का मूल कारण भारतीय लोकजीवन से परंपरागत सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों का कटाव है। आज बाल और महिला अपराधों में तेजी मूलत संस्कारहीनता का नतीजा ही है। आज का समाज अपनी सम्रद्ध मूल्य विरासत को विस्मृत कर एक तरह की पतितावस्था में आ चुका है, यही उन अपराधों की जड़ है जो बच्चों और महिलाओं से जुड़े हैं। यह बात रविवार को चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की 24वीं ई-संगोष्ठी में जिला जज (सेवानि.) अनिल पारे ने कही। वे संगोष्ठी में देश भर के बाल अधिकार कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारी चेतना में भारतीय संस्कृति औऱ जीवन मूल्य पुनर्स्थापित नही होंगे तब तक कानून कारगर नहीं हो सकते हैं।

पारे ने न्यायालय में वाद प्रस्तुत किये जाने सबंधी विहित प्रक्रिया और प्रावधानों की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कैसे औऱ किन मुख्य आधारों पर न्याय निर्णय की कारवाई पूर्ण होती है। डिक्री और निर्णय के बुनियादी अंतरों को भी उन्होंने सरलता से बताने का प्रयास किया। संगोष्ठी में सिविल प्रक्रिया संहिता और आइपीसी सहित अन्य सहसबंधित प्रावधानों पर भी सिलसिलेवार चर्चा की गई। खुले सत्र में बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने पॉक्सो कंपनसेशन को लेकर न्यायालय द्वारा अधिक समय लिए जाने पर फाउंडेशन के सचिव डॉ. कृपाशंकर चोबे ने बताया कि पॉक्सो में विचाराधीन प्रकरणों में अंतिम निर्णय नही होने तक पूर्ण मुआवजा नही दिया जाता है। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि बड़ी संख्या में इस कानून का दुरुपयोग भी सामने आया है। संगोष्ठी में मप्र के 32 जिलों के सीडब्ल्यूसी/जेजेबी सदस्य सहित मप्र, छतीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, बिहार, झारखंड, यूपी, हिमाचल प्रदेश, आसाम के बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। आभार फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. राघवेंद्र शर्मा ने माना।

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