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गुना-शिवपुरी संसदीय सीट पर भाजपा के सामने प्रत्याशी का संकट-shivpuri news

– हार व सत्ता जाने के बाद और मायूसी बढ़ी

शिवपुरी। गुना-शिवपुरी संसदीय सीट से सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ भाजपा किसे प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतारेगी यह प्रश्न आम जनता के अलावा भाजपा में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। इस संसदीय सीट पर भाजपा के सामने दमदार प्रत्याशी का अभाव देखा जा रहा है। यही कारण है कि इस संसदीय सीट पर भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच मायूसी का माहौल है। मायूस कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि एक ओर कांग्रेस के संभावित उम्मीदवार और वर्तमान सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया लगातार इस क्षेत्र में संपर्क कर रहे है और अब तो पिछले कुछ दिनों से उनकी पत्नि प्रियदर्शनी राजे सिंधिया भी प्रचार में जुटी हैं। दूसरी ओर भाजपा में प्रत्याशी ही तय नहीं है कि यहां पर पार्टी किसे चुनाव लड़ाएगी। दमदार प्रत्याशी के अभाव के कारण के भाजपा कार्यकर्ता व पदाधिकारियों में वह तेजी व स्फूर्ति नहीं देखी जा रही है जो विधानसभा चुनाव से पहले थी। कई पार्टी नेताओं का मानना है कि भाजपा को जल्द से जल्द इस संसदीय सीट को लेकर अपनी रणनीति तय करना चाहिए। जिससे आने वाले चुनाव के लिए कार्यकर्ताओं के बीच जोश का माहौल देखा जा सके।

हार व सत्ता जाने के बाद और मायूसी

नवंबर में हुए विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश से शिवराज सरकार की विदाई के बाद यहां के भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह का अभाव देखा जा रहा है।  इसके अलावा गुना, शिवपुरी व अशोकनगर की जो आठ सीटें इस संसदीय सीट के अंतर्गत आती हैं उनमें से छह सीटों पर कांग्रेस विधायक निर्वाचित हुए हैं। केवल दो सीट ही भाजपा जीत पाई है। हालांकि कई भाजपा नेताओं का कहना है कि वर्ष 2013 में भी भाजपा केवल दो सीटें जीती थी और वहीं परिणाम इस बार भी रहे हैं। वहीं प्रदेश की सत्ता में वापसी से कांग्रेस में जरूर उत्साह का माहौल है।

आयतित प्रत्याशी की रणनीति कितनी कारगर?

भाजपा कार्यकर्ताओं में मायूसी के पीछे एक कारण यह भी कि भाजपा ने हमेशा यहां पर आयतित प्रत्याशी को ही मैदान में उतारा है। आयतित उम्मीदवारों को मैदान में उतारने से होता यह है कि प्रत्याशी चुनाव परिणाम आने के बाद यहां से चला जाता है और नियमित संपर्क नहीं रखता। इसलिए यहां पर स्थानीय प्रत्याशी को मैदान में उतारने की बात जोर पकड़ रही है। ऐसे में पार्टी के बीच संकट यह है कि ज्योतरादित्य के कद वाला स्थानीय स्तर पर कोई नेता ही नहीं है, तो मैदान में किसे उतारा जाए। स्थानीय स्तर पर पार्टी किसी चेहरे को मैदान में उतारती भी है तो आपस में ही स्थानीय नेता एक-दूसरे की टांग खीचेंगे। इसलिए पार्टी के सामने बड़ा संकट प्रत्याशी को लेकर है।

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