चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की 82 कार्यशाला सम्पन्न
शिवपुरी। देश में अधिकतर दम्पति कम उम्र के बच्चों को ही गोद लेना चाहते है और अधिक उम्र के बच्चे देश से बाहर गोद जाना चाहते है यह एक दुर्भाग्यपूर्ण मानसिकता है। इस स्थिति के कारण देश में दत्तक ग्रहण समावेशी तरीके से नहीं हो पा रहा है। हाल ही में केंद्र सरकार ने दत्तक ग्रहण के कुछ प्रावधानों में संशोधन किए है ताकि वास्तविक सरंक्षण श्रेणी के बालकों का बेहतर पारिवारिक पुनर्वास किया जा सके। यह बात आज चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की 82 वी ई कार्यशाला को संबोधित करते हुए कविता भंडारी ने कही।
भंडारी केंद्रीय दत्तक ग्रहण एजेंसी कारा की उपसमिति में लंबे समय तक जुड़ी रही है। उन्होंने बताया कि दत्तक ग्रहण के अब तक के आंकड़े बताते है कि भारतीय समाज में सबकी चाहत शिशुवय बच्चों को गोद लेने की है इसलिए बड़ी संख्या में बच्चे बाल देखरेख संस्थाओं में रहने के लिए मजबूर है, विशेष आवश्यकता वाले बच्चों एवं सूक्ष्म चिकित्सकीय आवश्यकताओं वाले बालकों का पुनर्वास भी भारत में एक बड़ी चुनोती है। भंडारी ने बताया कि बाल कल्याण समितियों द्वारा लीगल फ्री किये जाने वाले बच्चे अगर भारतीय अभिभावकों द्वारा दत्तक ग्रहण में नही लिए जाते है तो 60 दिवस बाद वे अंतर्देशीय दत्तक के लिए पात्र हो जाते हैं। हाल ही में सरकार ने विशेष श्रेणी के बच्चों के मामलों में यह समय सीमा पंद्रह से तीस दिन कर दी है। उन्होंने बताया कि कानूनी प्रावधान अपनी जगह है लेकिन किशोर न्याय अधिनियम से जुड़े सभी हितधारकों को यह प्रयास करना चाहिये कि भारतीय बच्चे अपने ही सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश में दत्तक ग्रहण में जाएं.सुश्री भंडारी ने बताया कि दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया में कई हितधारकों की भूमिका सुनिश्चित की गई है लेकिन देखने मे आया है कि बाल कल्याण समितियां अधिकतर कार्य अपने स्तर पर करती है जिसके चलते इस प्रक्रिया में बढ़ में कानूनी पेचीदगियां निर्मित होती है। बेहतर और पारदर्शी दत्तक प्रक्रिया के लिए कानूनी, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक परामर्श सेवाओं का बहुत महत्व है इसलिए समितियों को चाहिये कि वे बालकों का समर्पण करने वाले एवं दत्तक ग्रहण करने वाले सभी पक्षों की बेहतर काउंसिलिंग करें और इसके लिए पेशेवर लोगों की सहायता ही लें।
बाल अधिकार कार्यकर्ता तपोब्रत बोरा ने कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि इंटर कंट्री एडॉप्शन को कुछ शिशु गृह एवं सीसीआई बढ़ावा देने में सलंग्न है क्योंकि इससे इन संस्थाओं को अधिक अनुदान एवं दान प्राप्त होता है.उन्होंने बताया कि अधिकतर बाल देखरेख संस्थाओं एवं शिशु गृहों के पास पेशेवर परामर्शदाताओं की कमी है इसलिए बड़ी उम्र के लीगल फ्री बच्चों में विदेश जाने की ललक रहती है.श्री बोरा के अनुसार भारतीय अभिभावकों की रुचि कम होने का एक कारण कारा के पोर्टल पर लीगल फ्री बालकों की अधतन तस्वीरों का न होना भी हैं,इसलिए बल कल्याण समितियों को चाहिए कि वे इस कार्य पर निगरानी रखने का काम करें कि पोर्टल पर मानक छवि ही दर्ज हो.उन्होंने इंटर कंट्री मामलों में गतिरोध की स्थिति पर चिन्हित बालकों को तत्काल अपने सरंक्षण में लेने की कोशिश भी करना चाहिए क्योंकि विवादित परिवार में बच्चों का रहना हितकर नही है।
कार्यशाला का संचालन करते हुए फाउंडेशन के सचिव डॉ कृपाशंकर चौबे ने कहा कि बाल कल्याण समितियों की भूमिका एकमेव नही है इसलिए यथा संभव दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया को बहु पक्षीय भागीदारी के साथ आगे बढ़ाए जाने की कोशिश होनीं चाहिये। बालकों के माता पिता को दत्तक के संबद्ध में कानूनी सलाह पेशेवर विशेषज्ञ से ही उपलब्ध कराई जानी चाहिये। डॉ. चौबे ने जोर देकर कहा कि यह प्रक्रिया दो परिवारों के भावनात्मक औऱ सांस्कृतिक पक्षो से जुड़ी रहती है इसलिए बहुत ही सतर्कता, सावधानी औऱ संवेदनशीलता के साथ इसका निष्पादन किया जाना चाहिये। कार्यशाला के अंत मे आभार प्रदर्शन राकेश अग्रवाल ने किया।






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