
केदार सिंह गोलिया, शिवपुरी, शासकीय शिक्षकों की बात करें तो यह अपनी मांगों के लिए सिर्फ आंदोलन करते ही खुर्सियां बटोरते हैं, इन्हें कभी स्कूलों की व्यवस्थाओं या फिर बच्चों के भविष्य के लिए आंदोलन करते आपने कभी नहीं देखा होगा। खासबात यह है कि इन शिक्षकों को अपनी ही काबिलियत पर भरोसा नहीं है, यह अपने साथियों को भी नालायक समझते हैं। यह बात आपको अटपटी अवश्य लग रही होगी, लेकिन यह हकीकत है। चलो हम आपको समझाते हैं-गौर करने वाली बात यह है कि शासन से मोटी पगार कम से कम 25 हजार से 60 हजार तक औसतन लेने वाले इन शिक्षकों के बच्चों को यह निजी स्कूलों में पढऩे के लिए भेजते हैं। इसमें खासबात यह है कि अधिकांश निजी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की पगार दो हजार से शुरू होकर पांच हजार तक होती है, इससे थोड़े बड़े स्कूलों की बात करें तो उनमें पांच हजार से दस हजार तक की पगार पर काम करने वाले शिक्षक होते हैं जो इन मोटी पगार वाले शिक्षकों की नजर में बहुत ही होशियार और हाईटेक होते हैं। इन्हीं मोटर पगार धारी शिक्षकों के बच्चे शासकीय स्कूलों में यह इसलिए नहीं भेजते क्योंकि इन्हीं के मुुंह से यह कहते हुए आप सुन सकते हैं कि शासकीय स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती और वहां मास्टर सही से पढ़ाते नहीं तो अब आ गई न बात कि यह अपने साथी शिक्षकों को भी नालायक समझते हैं जो इनके बच्चों को पढ़ाने के लायक नहीं है। यह अपने बच्चों को पढ़ाने और भविष्य का निर्माण करने के लिए न के बराबर तनख्वाह लेने वालों पर भरोसा कर सकते हैं न कि मोटी पगारधारियों पर।
शासन द्वारा शिक्षा की गुणवत्ता सुधार करने के लिए करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं लेकिन फिर भी ढर्रा शासकीय स्कूलों में नहीं सुधर रहा, कभी शिक्षक शराबखोरी करते मिल जाते हैं तो कभी स्कूलों में गोबर, कंडे तो भूसा भरा मिल जाता है।
जब तक आप लोग जागरुक नहीं होंगे तक तक शासकीय स्कूलों का ढर्रा नहीं सुधरेगा क्योंकि जब तक लोगों की सोच है कि हमारा क्या शासन इन्हें तनख्वाह दे रही। हकीकत तो यह है कि शासन भी तो आप लोगों से टैक्स या अन्य रूप में पैसे वसूल कर रही है फिर आप अपनी खून पसीने की कमाई को यूं ही बर्बाद होते कब देख सकते हैं कुछ जबावदारी फिर आपकी भी तो बनती ही है जो आप निभाने से दूर भाग रहे हैं, इसलिए जागरुक बनो और देश की तरक्की में भागीदार बनो।






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