मोदी मंत्रिमंडल में वीरेन्द्र जगह पा गए और अटक गए प्रहलाद

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केंद्रीय मंत्रिमंडल में मध्यप्रदेश से वीरेन्द्र कुमार का चयन उतना
चौंकाने वाला नहीं रहा, जितना प्रहलाद पटेल का नाम कटना। सूबे की सियासत
में एंग्री यंगमैन माने जाने वाले पटेल के सर्मथकों को आखिरी समय तक भरोसा
था कि कोई और मंत्री बने चाहे न बनें, लेकिन प्रहलाद तो सौ फीसदी बनेंगे।
पर
देर शाम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह
की बैठक के बाद संभावित मंत्रियों की सूची में जब मध्यप्रदेश से शपथ लने
वालों में इकलौते वीरेन्द्र कुमार का नाम आया तब बारी सबके चौंकने की थी।
हालांकि केंद्रीय मंत्रिमंडल में किस राज्य को कितना महत्व दिया जाना है यह
प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है। न तो राज्य का कोई दावा होता है और न कोई
कोटा। क्षेत्रीय, जातीय संतुलन और सियासी नफा नुकसान, बस ये दो फॉर्मूले
काम करते हैं। विस्तार या फेरबदल करते समय परफॉर्मेंस ऑडिट प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी का पैमाना रहा है, इसलिए कुछ मंत्रियों के पत्ते कटे, कुछ के
विभागों पर कैंची चल गई। वहीं कुछ मंत्रियों को अच्छा खासा ईनाम भी मिला।
यह
जानते और मानते हुए भी, इसे लिखने में कोई बुराई नहीं कि मध्यप्रदेश को एक
मंत्री कम मिला। एक की गुंजाइश अब भी बनी हुई है। कहने को मोदी मंत्रिमंडल
में मध्यप्रदेश के कोटे से छह मंत्री है, लेकिन मध्यप्रदेश से डायरेक्ट तो
तीन ही हैं। ये हैं थावरचंद गेहलोत, नरेन्द्र सिंह तोमर और ताजे-ताजे
मंत्री बने वीरेन्द्र कुमार। सुषमा स्वराज, प्रकाश जावड़ेकर और एमजे अकबर
बाहरी राज्यों से होते हुए भी मध्यप्रदेश से सांसद हैं, इसलिए गिनती बढ़कर
छह हो गई।
एक की गुंजाइश इसलिए हैं कि फग्गनसिंह कुलस्ते के इस्तीफे
से खाली हुई जगह तो भर गई, लेकिन अनिल माधव दवे के निधन से रिक्त हुई सीट
आज तक खाली है। इसीलिए मध्यप्रदेश को उम्मीद थी कि कम से कम दो मंत्री
बनेंगे। सियासी संभावनाओं, अफवाहों, गुणा-भागों को झुठलाना भाजपा के मौजूदा
नेतृत्व की स्टाइल बन गई है, इसलिए आखिरी समय तक सस्पेंस कायम रहा।
वीरेन्द्र
कुमार का चयन उनकी लो प्रोफाइल कार्यशैली, जमीनी एप्रोच, विवादरहित
राजनीतिक व्यवहार और सांसद के तौर पर उनकी वरिष्ठता के साथ-साथ बुंदेलखंड
को प्रतिनिधित्व और दलित वर्ग को महत्व देने के लिए किया गया। हालांकि
मध्यप्रदेश में आदिवासियों की भी अच्छी खासी तादाद है। ऐसे में फग्गन सिंह
कुलस्ते को हटाकर किसी आदिवासी को ही समायोजित करने की उम्मीद थी, लेकिन
मौजूदा आदिवासी सांसदों में से मोदी-शाह की जोड़ी को कोई उपयुक्त नहीं लगा
होगा, इसलिए आदिवासी की जगह दलित वर्ग को बर्थ दे दी गई।
प्रहलाद
पटेल इस बार जरूर जगह पाएंगे, ऐसा भरोसा भाजपा में भी कई लोगों को था,
लेकिन वे एन वक्त मंत्रिमंडल की गाड़ी पर चढ़ने से वंचित रह गए। वह भी तब,
जबकि उन्हें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का विश्वस्त माना जाता है। पूर्वोत्तर
के राज्य मणिपुर में भाजपा को मिली शानदार सफलता के बाद प्रभारी के तौर पर
प्रहलाद पटेल मोदी-शाह की नजरों में चढ़े हुए थे, इसलिए भी उन्हें पुरस्कार
मिलने की उम्मीदें जताई जा रही थीं।
सत्ता के गलियारों के अय्यारों
की मानें तो प्रहलाद का नाम उमा भारती के कारण कटा। चूंकि उमा भारती और
प्रहलाद पटेल एक ही समुदाय से आते हैं, इसलिए प्रहलाद मंत्री पद पाने से
वंचित रह गए। हां, यह जरूर गलत हो गया कि कुलस्ते के हटने और प्रहलाद पटेल
के मंत्री न बनने के कारण महाकौशल का प्रतिनिधित्व अब शून्य हो गया है।