
कोलारस।
बिना तपस्या के संयम कभी टिक नहीं सकता क्योंकि संयम लेना तो भाग्य का
विषय है लेकिन उस संयम को जीवन के अंत समय तक निर्दोष पालना सौभाग्य का
विषय है। अपने जीवन में भाग्यशाली बनो, सौभाग्यशाली बनो, अहोभाग्यशाली बनो,
महाभाग्यशाली बनो लेकिन कभी भी दुर्भाग्यशाली नहीं बनो। उक्त उद्गार
मुनिश्री सुव्रतसागर जी महाराज ने श्री चन्द्रप्रभ दि. जैन मंदिर कोलारस
में चल रहे दशलक्षण पर्व में उत्तम तप धर्म के दिन व्यक्त किये। मुनिश्री
ने बताया कि तप के बिना मोक्षमार्ग चल नहीं सकता, संसार का कोई भी कार्य
बिना तप के नहीं चलता। बिना संयम, बिना तपपस्या के मोक्षमार्ग की कल्पना
इसी प्रकार होगा कि आकाश के पुष्प या बांझ स्त्री के पुत्र। यह तो कथंचित
संभव भी हो सकता है लेकिन बिना तप के धर्म की कल्पना करना असंभव है।
धर्मात्मा के अभाव में धर्म कभी टिक नहीं सकता, अत: कहा जा सकता है कि
दिगंबर मुनि ही चलता फिरता सबसे बड़ा तपस्यालय है। अपने जीवन में अगर
तपस्वी न बन सकें परन्तु जो तपस्वी बने हुए हैं उनके अनुयायी बने रहें यह
भी तपस्या से कम नहीं है। मुनिश्री ने उत्तम तप धर्म का महत्व बताते हुए
कहा कि संसार का हर प्राणी समस्या बनके खड़ा हुआ है, इसका समाधान क्या हो
सकता है इस पर विचार कोई नहीं करता। अत: समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाती
है, जितनी बड़ी समस्या है, उतनी बड़ी ही तपस्या होनी चाहिए। अगर देखा जाये
तो इन तपस्यों और तपस्वियों की साधना से ही भारत को तपोभूमि के रूप में
विश्व में जाना जाता है। भारत के अलावा और कहीं सम्यक तपस्या नहीं हो
सकती।ज्ञात रहे कि श्री दि. जैन पंचायती मंदिर में दसलक्षण पर्व के
प्रतिदिन अद्वितीय धर्मध्यान चल रहा है। प्रात:काल सिद्धयोग, शांतिधारा,
सामूहिक पूजन, तत्वार्थ सूत्र के एक अध्याय का स्वाध्याय, प्रतिदिन एक धर्म
पर प्रवचन, दोपहर में पुन: तत्वार्थ सूत्र का अध्ययन, सायंकाल आरती भक्ति,
जिज्ञासा समाधान, सांस्कृतिक कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में
धर्मावलंबी सम्मिलित होकर धर्मलाभ ले रहे हैं।
बिना तपस्या के संयम कभी टिक नहीं सकता क्योंकि संयम लेना तो भाग्य का
विषय है लेकिन उस संयम को जीवन के अंत समय तक निर्दोष पालना सौभाग्य का
विषय है। अपने जीवन में भाग्यशाली बनो, सौभाग्यशाली बनो, अहोभाग्यशाली बनो,
महाभाग्यशाली बनो लेकिन कभी भी दुर्भाग्यशाली नहीं बनो। उक्त उद्गार
मुनिश्री सुव्रतसागर जी महाराज ने श्री चन्द्रप्रभ दि. जैन मंदिर कोलारस
में चल रहे दशलक्षण पर्व में उत्तम तप धर्म के दिन व्यक्त किये। मुनिश्री
ने बताया कि तप के बिना मोक्षमार्ग चल नहीं सकता, संसार का कोई भी कार्य
बिना तप के नहीं चलता। बिना संयम, बिना तपपस्या के मोक्षमार्ग की कल्पना
इसी प्रकार होगा कि आकाश के पुष्प या बांझ स्त्री के पुत्र। यह तो कथंचित
संभव भी हो सकता है लेकिन बिना तप के धर्म की कल्पना करना असंभव है।
धर्मात्मा के अभाव में धर्म कभी टिक नहीं सकता, अत: कहा जा सकता है कि
दिगंबर मुनि ही चलता फिरता सबसे बड़ा तपस्यालय है। अपने जीवन में अगर
तपस्वी न बन सकें परन्तु जो तपस्वी बने हुए हैं उनके अनुयायी बने रहें यह
भी तपस्या से कम नहीं है। मुनिश्री ने उत्तम तप धर्म का महत्व बताते हुए
कहा कि संसार का हर प्राणी समस्या बनके खड़ा हुआ है, इसका समाधान क्या हो
सकता है इस पर विचार कोई नहीं करता। अत: समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाती
है, जितनी बड़ी समस्या है, उतनी बड़ी ही तपस्या होनी चाहिए। अगर देखा जाये
तो इन तपस्यों और तपस्वियों की साधना से ही भारत को तपोभूमि के रूप में
विश्व में जाना जाता है। भारत के अलावा और कहीं सम्यक तपस्या नहीं हो
सकती।ज्ञात रहे कि श्री दि. जैन पंचायती मंदिर में दसलक्षण पर्व के
प्रतिदिन अद्वितीय धर्मध्यान चल रहा है। प्रात:काल सिद्धयोग, शांतिधारा,
सामूहिक पूजन, तत्वार्थ सूत्र के एक अध्याय का स्वाध्याय, प्रतिदिन एक धर्म
पर प्रवचन, दोपहर में पुन: तत्वार्थ सूत्र का अध्ययन, सायंकाल आरती भक्ति,
जिज्ञासा समाधान, सांस्कृतिक कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में
धर्मावलंबी सम्मिलित होकर धर्मलाभ ले रहे हैं।






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