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एक रुपया हाथ पै आना नहीं। घर पै जाऊं या नहीं मैं क्या करूं।।

साहित्यिक संस्था बज्मे उर्दू का मुशायरा संपन्न
शिवपुरी। बज्मे उर्दू की मासिक काव्यगोष्ठी गतदिवस शहर केएबी रोड िस्थत गांधी सेवा आश्रम में आयोजित हुई। यह काव्य गोष्ठी डाॅ. मुकेश अनुरागी की अध्यक्षता में आयोजित हुई। इस काव्यगोष्ठी का संचालन सत्तार शिवपुरी ने किया। इस गोष्ठी में मुख्य अतिथि हास्य व्यंग के कवि राजकुमार भारती थे। तरही मिसरे आप ही बतलाइएगा क्या करूं ? पर लिखे गए प्रमुख अंश देखें –
रफीक इशरत ग्वालियरी लिखते हैं:-
है दुआ इशरत की ऐ परवर दिगार।
काम कोई बद न दानिस्ता करूं।।
वहीं सत्तार शिवपुरी लिखते है:-
एक रूपया हाथ पै आना नहीं।
घर पै जाऊं या नहीं मैं क्या करूं ?।।
इन्हीं का एक और शेर देखें:-
वेहया है सामने वाला देश।
लाजिमी है मैं ही अब पर्दा करूँ।।
साजिद अमन लिखते है:-
नाम हो जये वतन का हर तरफ।
चाहता हूँ काम कुछ ऐसा करूं।।
वहीं भगवान सिंह यादव कहते है ंः-
मुफलिसी में तो गुजर होती नहीं।
रोग अपने का मदावा क्या करूं।।
राम कृष्ण मोर्य मयंक के जज्बात देखें:-
याद ये दुनिया मुझे करती रहे।
सोचता हूं काम कुछ ऐसा करूं।।
गैर तरह पर डाॅ. मुकेश अनुरागी ने नये वर्ष क संदर्भ रचना पढ़ी:-
बदल गया बस दीवारों की ठुकी कील पर टंगा कलंेडर।
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