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नए मुख्यमंत्री के एक महीने का एनालिसिस MP के : हावी नहीं होने देंगे अफसरशाही , नाराज नहीं होंगी बहनें भी ; कई संदेश इसी तरह के / भोपाल

डॉ. मोहन यादव उज्जैन में अपने घर पर ही रात्रि विश्राम करते रहे हैं, लेकिन 16 दिसंबर को जब उन्होंने अपने घर पर रात बिताई तो बड़ी खबर बन गई। किसी मुख्यमंत्री के उज्जैन में रात नहीं रुकने के मिथक को उन्होंने तोड़ दिया। इसमें मैसेज था – नई सरकार नई सोच के साथ आगे बढ़ेगी। एक महीने के दौरान डॉ. यादव ने अपने फैसलों और वर्किंग स्टाइल से इसी तरह के मैसेज दिए हैं – ब्यूरोक्रेट्स को और जनता को।

पिछले महीने 11 तारीख को विधायक दल की बैठक में नेता चुने जाने के दो दिन बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन पावरफुल CM हुए 30 दिसंबर को जब मंत्रियों को विभाग बांटकर काम सौंपा।

डॉ. यादव ने गृह, जेल, उद्योग, खनिज जैसे महत्वपूर्ण महकमों की कमान सीधे तौर पर अपने पास रखी। यानी ये विभाग किसी मंत्री को नहीं दिए। जाहिर है, यह निर्णय दिल्ली का ही था। खास रणनीति के तहत। खास संदेश के साथ।

एक महीने के दौरान लिए बड़े फैसलों, मैसेज और सामने आए सवालों को समझते हैं…

तीन बड़े फैसले..

1. अफसरों पर कार्रवाई, मैसेज – जिम्मेदारी ऊपर तक तय होगी

शपथ लेने के तीसरे दिन छिंदवाड़ा पहुंचे। मंच पर कलेक्टर से बात करते हुए कहा- ‘कलेक्टर साहब ध्यान रखिए पटवारी से गलती हुई तो आप पर भी कार्रवाई होगी।’ संदेश था – गड़बड़ी हुई तो बड़े भी नहीं बचेंगे। ऐसा कर भी दिया। गुना बस हादसे में 13 लोग जिंदा जल गए। RTO को तो सस्पेंड किया ही, परिवहन आयुक्त व विभाग के प्रमुख सचिव तक को हटा दिया। प्रदेश में ऊपर तक की कार्रवाई पहली मर्तबा हुई।

सबसे चर्चित फैसला तो शाजापुर कलेक्टर को हटाने का रहा। कलेक्टर ने एक बैठक में ड्राइवर को औकात दिखाने की बात कह दी थी। अगले दिन मुख्यमंत्री ने कहा- ऐसी भाषा बर्दाश्त नहीं। कुछ मिनट बाद कलेक्टर को भोपाल बुलाने का आदेश जारी हो गया।

दरअसल, शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल के दौरान अफसरशाही के हावी होने की बातें पार्टी फोरम में भी चर्चा का विषय बनती रहीं। शिवराज ने अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में इस बात को समझा और फिर ‘नायक’ स्टाइल में मौके पर ही फैसले सुनाना शुरू कर दिए। मंच से ही अफसर सस्पेंड। कलेक्टर-SP को चेतावनी। तब तक देर हो चुकी थी। नए मुख्यमंत्री ने बिना देर किए इस देरी को समझ लिया।

फैक्ट : अब तक 9 कलेक्टर, 3 SP, 1 संभागायुक्त को मैदानी पोस्टिंग से हटाकर भोपाल बुलाया। कुल 45 IAS अफसरों को इधर से उधर किया है। इनमें अतिरिक्त मुख्य सचिव से लेकर कलेक्टर शामिल हैं। 11 IPS भी प्रभावित हुए।

मुख्यमंत्री के अफसरों की कोर टीम

2. लाड़ली बहनों के खाते में राशि, मैसेज- 1250 रुपए देते रहेंगे, 3000 तय नहीं

शिवराज सिंह चौहान की मुख्यमंत्री पद से विदाई के बाद से ही सबसे ज्यादा चर्चा लाड़ली बहनों को लेकर हुई। सवाल उठने लगे कि 10 तारीख को लाड़ली बहना के खाते में रुपए आएंगे या नहीं? 10 तारीख आई और लाड़ली बहनों के खाते में रुपए भी आए। पहले की तरह इवेंट भी हुआ। महिलाओं ने नए मुख्यमंत्री के साथ सेल्फी भी ली। सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि लाड़ली बहना योजना चलती रहेगी। राशि 1250 से बढ़ाकर 3000 रुपए तक ले जाने के शिवराज के वादे पर नई सरकार ने अभी रुख स्पष्ट नहीं किया है।

वैसे भी भाजपा के घोषणा पत्र में जिक्र था- लाड़ली बहनों को आर्थिक मदद जारी रहेगी। 3000 रुपए को लेकर पार्टी ने कोई औपचारिक वादा नहीं किया। यानी 1250 रुपए ही हर महीने मिलेंगे।

फैक्ट : 1.29 लाख करोड़ महिलाओं के खाते में 1576 करोड़ रुपए ट्रांसफर हुए, हालांकि पिछली सरकार की तुलना में महिलाओं की संख्या 1.5 लाख कम होने को लेकर कॉन्ट्रोवर्सी जरूर हुई। सरकार ने इसका कारण भी बताया।

लेकर कॉन्ट्रोवर्सी जरूर हुई। सरकार ने इसका कारण भी बताया।

10 जनवरी को लाड़ली बहना योजना की राशि ट्रांसफर करने से पहले CM डॉ. मोहन यादव ने कन्या पूजन किया।

10 जनवरी को लाड़ली बहना योजना की राशि ट्रांसफर करने से पहले CM डॉ. मोहन यादव ने कन्या पूजन किया।

3. संभागों में जाकर रिव्यू, मैसेज- अफसरों को फील्ड में फोकस करना होगा

मुख्यमंत्री एक महीने के दौरान पांच संभागों में पहुंचकर समीक्षा कर चुके हैं। बैठकों के दौरान अफसरों के परफॉर्मेंस को भी देखा जा रहा है। जबलपुर संभाग की बैठक के बाद जबलपुर कलेक्टर सौरव कुमार सुमन को हटा दिया। ऐसा पहली बार हो रहा है कि मुख्यमंत्री संभागीय मुख्यालय पर पहुंचकर पूरे संभाग का रिव्यू कर रहे हैं। इससे पहले राजधानी से ही संभागों की समीक्षा होती थी और संभागीय मुख्यालय एक तरह से डाकिए की भूमिका में थे।

नई व्यवस्था में वल्लभ भवन में बैठे वरिष्ठ अफसरों को भी फील्ड में जाने की आदत डालने के लिए संभागों का जिम्मा सौंपा। अपर मुख्य सचिवों को संभागीय प्रभारी नियुक्त कर उन्हें संभाग की जिम्मेदारी दी है। इसी तरह अतिरिक्त पुलिस महानिदेशकों (ADG) को भी एक-एक संभाग की कानून-व्यवस्था को ठीक रखने का जिम्मा दिया। अब वे भी PHQ से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत देखेंगे। संदेश साफ है- दफ्तरों में बैठकर निर्णय लेने की बजाय भागदौड़ कर जमीनी हालातों को जानना-समझना होगा।

फैक्ट : मध्यप्रदेश में 10 संभागीय मुख्यालय हैं। इन संभागों के लिए 10-10 सीनियर IAS और IPS अफसरों की ड्यूटी लगाई गई है। इनकी रिपोर्ट सीधे मुख्य सचिव के मार्फत मुख्यमंत्री के पास जाएगी।

मंत्रियों को विभागों के बंटवारे के बाद CM डॉ. मोहन यादव ने जबलपुर में कैबिनेट बैठक की थी।

मंत्रियों को विभागों के बंटवारे के बाद CM डॉ. मोहन यादव ने जबलपुर में कैबिनेट बैठक की थी।

एक बड़ा बदलाव..

हर मुद्दे पर और हर रोज बोलने वाले भी ‘खामोश’

गौर करने वाली बात है कि एक महीने के दौरान पार्टी के किसी मंत्री या उत्साही नेता का ऐसा कोई बयान नहीं आया है जिसकी वजह से पार्टी को बैकफुट पर जाना पड़े या सरकार को सफाई देना पड़े। नरोत्तम मिश्रा से लेकर रामेश्वर शर्मा तक। अजीब सी खामोशी। डॉ. मोहन यादव को नई जिम्मेदारी के लिए कम्फर्ट रखने के लिए दिल्ली से जारी दिशा-निर्देशों का नतीजा है।

एक उदाहरण से समझिए- राज्यमंत्री दिलीप अहिरवार मीडिया के सवालों के जाल में उलझ गए। बोल पड़े – ‘अरे वर्तमान मुख्यमंत्री को देखो। पूर्व मुख्यमंत्री ने तो न जाने किन-किन को गोद लिया था, इसलिए यह उसी का तो परिणाम है। वे गोद लेते थे, करते तो कभी कुछ थे नहीं।’ उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था, लेकिन कांग्रेस ने उनके बयान को पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज से जोड़ दिया।

अहिरवार को सफाई देने शिवराज के पास जाना पड़ा। मीडिया ने मुलाकात और बयान के बारे में सवाल किया। उन्होंने जवाब देने की बजाय हाथ जोड़े और बोले- ‘मुझे माफ कर दो।’ इसके बाद इस एपिसोड का द एंड।

डॉ. मोहन सरकार का मैसेज है कि कुछ भी बोल देने की स्वच्छंदता स्वीकार नहीं। यह भी कि हर मुद्दे पर और हर रोज बोलना भी जरूरी नहीं है।

फैक्ट : शिवराज सरकार में गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा भोपाल में अपने बंगले पर रोज मीडिया से चर्चा करते थे। मीडिया के लिए वे किसी भी विवादित बयान पर टिप्पणी के लिए सहज सुलभ थे।

दो बड़े सवाल..

1. नई दिल्ली से कितना डायरेक्शन?

13 दिसंबर को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के 12 दिन बाद 25 दिसंबर को मंत्रिमंडल बना। इसके 5 दिन बाद 30 दिसंबर को मंत्रियों को विभागों का बंटवारा कर दिया गया। माना गया कि बड़े नेताओं को ‘सम्मानजनक’ स्थिति में रखने और पावर बैलेंस पर मंथन की वजह से इन सब में देरी हुई। इस दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 3-4 मर्तबा दिल्ली गए। सब कुछ वहीं से फाइनल हुआ है, हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ।

शिवराज मंत्रिमंडल को लेकर भी ऐसा ही होता था, लेकिन इस बार चर्चा हुई डॉ. मोहन यादव की वजह से। जिस तरह मुख्यमंत्री के तौर पर उनका नाम दिल्ली से तय होकर आया, हर बड़े फैसले को लेकर दिल्ली का नाम स्वाभाविक तौर पर जुड़ेगा। यह उनके लिए मजबूत पक्ष भी रहेगा और कमजोर पक्ष भी।

2. सभी 29 सीटें जीतने की कितनी तैयारी?

अगले तीन महीने में मुख्यमंत्री डॉ. यादव को पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा देनी होगी। उनके इस पहले पॉलिटिकल एग्जाम का फॉर्मेट ही कुछ ऐसा है कि मिनिमम 100% मार्क्स लाने का दबाव रहेगा। यानी सभी 29 सीटें जीतने का टारगेट।

2019 में छिंदवाड़ा को छोड़कर बाकी सभी 28 सीटें भाजपा ने जीती थीं। तब भाजपा राज्य में विपक्ष में थी। कमलनाथ के कारण छिंदवाड़ा अभी भी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है। विधानसभा चुनाव में इस लोकसभा क्षेत्र के दायरे में आने वाली सभी सात सीटें कांग्रेस ने जीतीं। इसी कारण पार्टी ने तो विधानसभा चुनाव के रिजल्ट के दिन से ही छिंदवाड़ा पर काम शुरू कर दिया। पार्टी की तैयारी ‘युद्ध लड़ने’ जैसी है।

इसके बावजूद MP की लोकसभा सीटों के रिजल्ट को मोहन सरकार के परफॉर्मेंस से जोड़कर ही देखा जाएगा। इसी को देखते हुए वे एक्शन मोड में दिख रहे हैं और संगठन के साथ होम वर्क भी कर रहे हैं।

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