शिवपुरी। होलिका अष्टक 10 मार्च को सुबह 6:32 बजे से अर्थात सूर्योदय के साथ प्रारंभ हो जाएंगे। होलिका अष्टक की अवधि होलिका दहन के साथ 17 मार्च को स्वत: ही समाप्त हो जाएगी। इस तरह फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा परियंत होलिका अष्टक मनाया जाएगा। होलिका अष्टक शुरू होने के साथ ही विवाह, नूतन गृह प्रवेश, देव प्राण प्रतिष्ठा, नूतन गृह निर्माण, मुंडन जैसे शुभ मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाएगी।
इसके अलावा होलिका अष्टक लगने के बाद मकान-वाहन की खरीदारी की मनाही होती है। होलिका दहन के बाद शुभ मांगलिक कार्य खरमास रहने के कारण प्रारंभ नहीं हो पाएंगे। इसलिए शुभ मांगलिक कार्यों का प्रारंभ नूतन संवत्सर 2079 के प्रारंभ होने के बाद मेष राशि में सूर्य का प्रवेश 14 अप्रैल के होने के बाद प्रारंभ हो जाएंगे।
ज्योतिषाचार्य पं. मोहन ने बताया कि फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से होलिका अष्टक प्रारंभ हो जाते हैं। इसी दिन से एक पेड़ की शाखा काटकर उसमें रंग बिरंगे कपड़ों के टुकड़े बांधे जाते हैं। फिर इस शाखा को जमीन में गाड़ दिया जाता है। लोग इसके चारों तरफ सूखी लकड़ी एवं गाय के गोबर से बने उपलों या कंडों को एकत्रित करते हैं।
होलिका दहन के दिन भद्रा रहित शुभ समय में नृसिंह भगवान एवं भक्त प्रहलाद के पूजन के बाद अग्नि पूजन करके होलिका दहन किया जाएगा। इसके बाद प्रमुख होलिका दहन की प्रज्वलित अग्नि को अपने घर ले जाकर पूजन के साथ होलिका दहन किया जाता है।
होली सदमिलन, मित्रता तथा एकता का पर्व है
होलिका दहन की रात्रि में ईष्ट देव की आराधना, मंत्र जागरण, तांत्रिक क्रियाओं की सिद्धि करना विशेष शुभ माना जाता है। इस दिन मनु का जन्म होने से इसे मनुवादी तिथि भी कहा जाता है। इसके साथ ही जब भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था। तभी से इस त्यौहार का प्रचलन हुआ है।
प्रमुख तौर पर यह त्यौहार से भक्त प्रहलाद से संबंधित है। भक्त प्रहलाद की स्मृति और असुरों के नष्ट होने की खुशी में यह त्यौहार मनाया जाता है। होली सदमिलन, मित्रता तथा एकता का पर्व है। इस दिन द्वेष भाव त्यागकर सबसे सप्रेम मिलना चाहिए। होलाष्टक का समय भक्ति भाव के लिए बहुत अच्छा होता है, इसलिए इस समय में सुबह देर तक न सोएं। सुबह जल्दी उठें और स्नान के बाद सूर्य को जल चढ़ाएं। इससे देवी देवता का आशीर्वाद मिलेगा।




