Press "Enter" to skip to content

मानसिक रोगों से लड़ने के लिए संवेदनशीलता की जरूरत : डॉ राघवेंद्र / Shivpuri News

देश में 50 मिलियन बच्चे मानसिक समस्याओं से ग्रस्त :डॉ लहारिया

चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की 86 वी ई कार्यशाला *

शिवपुरी। मानसिक बीमारी हमारे समाज को बहुत तेजी से अपनी गिरफ्त में ले रही है।आज से 20 साल पहले इस मामले पर कोई खास चर्चा नही होती थी लेकिन बदलती जीवनशैली ने आज इसे ज्वलन्त समस्या बना दिया है। किशोरवय वर्ग में जिस तेजी से मानसिक रोग बढ़ रहे है उसके अनुपात में उपचार की सुविधाएं देश मे उपलब्ध नही है। समस्याग्रस्त 90 फीसदी लोगों को मानक उपचार आज भी उपलब्ध नही है।यह बात आज चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन द्वारा आयोजित ई कार्यशाला को संबोधित करते हुए ग्वालियर मानसिक आरोग्यशाला के प्रोफेसर डॉ संजय लहरिया ने कही।

उन्होंने बताया कि भारत में 424 मिलियन बच्चों में से 50 मिलियन किशोर किसी न किसी स्तर पर मानसिक समस्याओं से ग्रस्त हैं।दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि देश में मनोचिकित्सक की भारी कमी है।केवल मेट्रो शहर एवं मेडिकल कॉलेज स्तरपर ही मानक मानसिक स्वास्थ्य परामर्श एवं सुविधाये उपलब्ध है इसके चलते किशोरों में आरम्भिक रूप से मानसिक अवसाद से लेकर बीमारियों तक को चिन्हित नही किया जा पाता है।डॉ लहरिया ने बताया कि देश में मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम जिला स्तर पर क्रियान्वित किया जा रहा है लेकिन इसके लिए दक्ष मानव संसाधन का अत्याधिक आभाव है इसलिए सरकार ने नियमित चिकित्सीय संवर्ग को मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों से जोड़कर उन्हें प्रशिक्षित करने का अभियान भी सुनिश्चित किया है उन्होंने बताया कि देश में नया मानसिक स्वास्थ्य कानून बना लिया गया है जो पहले से चले आ रहे 1987 के कानून का स्थान लेगा हालांकि मध्यप्रदेश में अभी इस नए कानून को लागू नहीं किया जा सका है लेकिन जैसे ही यह कानून लागू होगा उसके बाद मानसिक बीमारियों का इलाज बहुत ही प्रामाणिक तरीके से संभव हो सकेगा नए एक्ट में मेंटल हेल्थ बोर्ड एवं रिव्यू बोर्ड गठित किए जाएंगे जो मानसिक रूप से दिव्यांग जनों को बहुत ही बेहतर तरीके से पुनर्वास का काम करेंगे उन्होंने बताया कि फिलहाल नेशनल ट्रस्ट के माध्यम से भी दिव्यांग जनों के पुनर्वास के लिए विभिन्न प्रकार की योजनाएं संचालित हैं ।उन्होंने यह भी कहा कि मानसिक अस्वस्थ था बहुत ही व्यापक अवधारणा है इसलिए मेंटल डिसऑर्डर ऑटिज्म डेवलपिंग डिसऑर्डर एवं एस एल डी जैसे मामलों में उच्च स्तरीय चिकित्सीय परामर्श के बाद ही हमें किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए दुलारिया के अनुसार 40% से कम दिव्यांग बच्चों के मामले में माता पिता एवं अन्य सन रक्षकों को दहेज से काम लेना चाहिए क्योंकि ऐसे मामलों में उचित चिकित्सीय परामर्श एवं थेरेपी के जरिए इन बच्चों की दिव्यांगता को घटाकर 20 और उससे कम प्रतिशत पर लाया जा सकता है इसलिए हमारा यह दायित्व की 40% से कम दिव्यांग बच्चों के मामले में हम उन्हें मुख्यधारा में लाने का प्रयास करें गवारिया के अनुसार भारत में एक सामाजिक विकृति यह देखी जाती है कि मानसिक रूप से कमजोर हर व्यक्ति को एक तरह से पागल के रूप में लिया जाता है और अधिकतर मामलों में संरक्षक ऐसे बच्चों और वयस्कों को मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती कराने के बाद भूल जाते हैं जबकि इनमें से अधिकतर उपचार के बाद स्वस्थ हो जाते हैं इसके बावजूद परिजन उन्हें घर ले जाने के लिए राजी नहीं होते डॉक्टर लहारिया के मुताबिक भारत सरकार ने ऐसे मामलों के लिए ‘लोंग स्टे होम’ योजना आरंभ की है जहां पर मानसिक आरोग्यशाला और अस्पतालों से स्वस्थ हुए लोग निवास कर सकते हैं ।उन्होंने स्वीकार किया कि देश में बच्चों एवं किशोरों के लिए मानसिक स्वास्थ्य के दृष्टिगत अभी भी बहुत आदर्श परिस्थितियां उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने आशा जताई कि नए कानून के लागू होने के साथ ही अनाथ बेसहारा एवं परित्यक्त बच्चों के मामले में पुनर्वास के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हो सकेंगी। डॉक्टर लहारिया के अनुसार वर्तमान में अगर किसी अनाथ बच्चे का मामला सामने आता है तो सामाजिक न्याय विभाग की जवाबदेही बनती है कि वह उस बच्चे के मामले में पुनर्वास हेतु हर संभव भूमिका का निर्वहन करें उन्होंने कहा कि बाल कल्याण समितियों एवं अन्य बाल अधिकार कार्यकर्ताओं को ऐसे बच्चों के मामले में जो संरक्षण की श्रेणी में आते हैं तत्काल सामाजिक न्याय विभाग से संपर्क स्थापित किया जाए।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ राघवेंद्र शर्मा ने कहा कि निसंदेह मानसिक बीमारियां बदलते वक्त में एक बड़ी चुनौती हैं लेकिन इस चुनौती का सामना केवल सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता खासकर बच्चों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज के परिवेश में जिस तरीके से बच्चे मानसिक दबाव का सामना कर रहे हैं। हमें एक नई सोच के साथ अपनी मानसिकता में बदलाव लाना चाहिए उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि मानसिक मानसिक रूप से समस्या ग्रस्त बच्चों को बहुत ही संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है। घर या घर के बाहर ऐसे सभी बच्चों को हम मुख्यधारा में लाने के लिए पहले अपनी मानसिकता में परिवार बहुत और संवेदनशीलता सुनिश्चित करें। तभी हम समाज की इस बड़ी होती चुनौती का सामना कर सकते हैं। चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन के सचिव डॉ कृपाशंकर चौबे ने बाल कल्याण समितियों के साथ देशव्यापी अनुभव को साझा करते हुए कहा कि फिलहाल मानसिक रूप से समस्या ग्रस्त बच्चों के मामले में कोई बेहतर पुनर्वास तंत्र उपलब्ध नहीं है। इस कारण आवश्यकता एवं संरक्षणमंद बच्चों को के मामले में बहुत विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है ।डॉक्टर चौबे ने आशा जताई कि नए मानसिक स्वास्थ्य कानून में उन सभी विसंगतियों को कवर किया जाएगा जो जुबेनाइल जस्टिस एक्ट के क्रियान्वयन के दौरान बाल अधिकार कार्यकर्ताओं एवं स्टेकहोल्डर्स को महसूस होती हैं।

More from Fast SamacharMore posts in Fast Samachar »

Be First to Comment

Leave a Reply

error: Content is protected !!