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जीवन में पतन रोकने के लिए अहंकार का त्याग करें: मुनिश्री विशोक सागर 

खनियांधाना नगर के श्री पाश्र्वनाथ दिग. जैन बड़ा मन्दिर जी मे चल रहे मुनि श्री विशोक सागर जी महाराज के पावन वर्षायोग के अंतर्गत चल रहे प्रतिदिन प्रवचनों में काव्य रचना मेरी भावना के अर्थ की श्रृंखला में आज शनिवार को व्यक्ति के जीवन में अहंकार विषय पर प्रवचन करते हुए मुनि श्री ने कहा कि अहंकारी का जीवन हमेशा पतन की ओर जाता है, जवकि  विनयवान व्यक्ति उच्च स्थान को प्राप्त करता है। उन्होंने रावण, कंस एवं कौरवों के उदाहरण से बताया कि कैसे इन महा बलशालियों का दुखद अन्त केवल अहंकार के कारण हुआ। अगर हमे अपने जीवन मे सदगुण लाना है तो गुरू के शरण मे जाना पडेगा विनय पूर्वक ही हम ज्ञानाजर्न कर सकते हैं। ज्ञानाभ्यास के माध्यम से ही संसार के दुखो से छुटकारा पा सकते है, पशु पक्षियों के माध्यम से बताते हुए कहा कि बकरी में – में करके अपना सिर कटवाती है जबकि मैना में – ना अपने अहंकार को खोकर दूध चावल खाती है।  मिट्टी भी अहंकार का त्याग कर अनेक कष्टों को सहन करती हुई कलश रूप परिवर्तित होकर सिर पर स्थान पाती है। पूर्व कृत पुण्य कर्मो के उदय मे हमे उपलब्धियॉ प्राप्त होती है, हमें ज्ञान, प्रतिष्ठा ,कुल ,जाती ,रूप ,बल , धन आदि उत्कृष्ट रूप मे प्राप्त होते है लेकिन हम अहंकार के कारण इनका दुरुपयोग कर पतन को प्राप्त होते है। जैसे फुटबॉल हवा का साथ पाकर फूल जाती है अकड़ जाती है इसके कारण उसे एक -दो नही बल्कि बाइस लोगों द्वारा पैरों से खेली जाती है, लेकिन हवा निकलते ही उसकी अकढ़ ढ़ीली पड़ते ही एक कोने मे रख दी जाती है उसी प्रकार यह जीव भी उपलब्धि रूपी हवा में अकड जाता है उचित अनुचित का विवेक खो बैठता है तथा चारों गतियों में ठोकर खाता है अत: कुछ मनुष्य जो ज्ञानी है बह अहंकार को त्याग कर नम्र हो जाते हैं।

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