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बिना छल, कपट के साथ अपना जीवन जीना ही आर्जव धर्म है: मुनि सुव्रतसागरज

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कोलारस
दगा किसी का सगा नहीं है आर्जव धर्म किसी के साथ छल, कपट, मायाचारी, ठगनी
आदि करना आर्जव धर्म को नष्ट करता है। आर्जव धर्म का मतलब है बिना छल, कपट
के साथ अपना जीवन जीना। यह उद्गार मुनि श्री सुव्रतसागर जी महाराज ने श्री
चन्द्रप्रभ दिगम्बर जैन मंदिर पर व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि क्रोध का
त्याग सर्वथा न करके उसकी दिशा बदले तो आपके जीवन की दशा बदल जाएगी ऐसे ही
मान का सर्वथा त्याग न करे बल्कि इस बात पर मान करे कि हम सभी जिन शासन में
परमपूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की छाया में जी रहे हैं और
मायाचारी करने का सर्वथा त्याग न करके दुनिया के साथ मायाचारी न करे। छल,
कपट न करे अगर करना ही है तो किसी को मोक्ष मार्ग में लगाने के लिए छल, कपट
कर सकते हैं मुनि श्री सागर चक्रवर्ती का दृष्टान्त देते हुए अपनी बात को
पुष्ट किया। उन्होंने संसार को मायाजाल बताते हुए कहा कि यह संसार मायाजाल
का ही विस्तार है हर व्यक्ति एक-दूसरे को मायाजाल में कसने के लिए आतुर है
मात्र दिगम्बर संत ही ऐसे होते हैं जो माया की माया से बचने के लिए अपनी
छाया देते हैं। शिकारी आएगा जाल फैलाएगा दाने का लोभ दिखाएगा और आपको इसमें
फंसा लेगा। अत: इससे बचने का नाम ही आर्जव धर्म है। ज्ञातव्य रहे कि विगत
चार दिनों से पर्युषण पर्व की आराधना में कोलारस में बहुत धार्मिक माहौल
बना हुआ है। प्रतिदिन शिविर जैसा नजर आता है लोगों की दिनचर्या चौबीस घण्टे
धर्मध्यान में व्यतीत हो रही है। मुनिश्री द्वारा प्रतिदिन तत्वार्थ सूत्र
का अर्थ पाठ व प्रतिधर्म पर प्रवचन किये जा रहे हैं और ब्रह्मचारी अंशु
भैया, सिद्धार्थ भैया ललितपुर, कलाकार संजय भैया भोपाल नृत्य नाटिका, इनके
द्वारा भी धर्म ध्यान कराया जा रहा है। मुनिश्री के प्रवचनों से प्रेरणा
पाकर समाज प्राचीन पंचमेरूओं की प्रतिष्ठा हेतु संकल्पित हुई है। चूंकि
पंचमेरू तो प्राचीन हैं किन्तु उनमें विम्ब न होने से अमंगल जैसा होता है
अत: समाज अतिशीघ्र अस्सी जिनविम्बों की प्रतिष्ठा कराके मेरूओं में
विराजमान करेगी। जिसे पूरी समाज ने सहस स्वीकार किया।
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