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जिला अस्पताल को स्वयं उपचार की जरूरत, आखिर कैसे करेगा यह मरीजों का उपचार


शिवपुरी। जिला अस्पताल शिवपुरी सफाई के मामले में प्रदेश में दो-दो बार पुरूस्कार जीत कर No.1 अस्पताल बनने का तमगा हासिल कर लिया लेकिन यहां पर मरीजों को सिर्फ दर्द के अलावा और कुछ हासिल नहीं हो रहा हैं क्योंकि चिकित्सक स्वयं मरीजों पर सहज भाव से परीक्षण तो नहीं उन्हें झल्लाकर पेश आते हैं और तड़पते मरीजों को तत्काल ग्वालियर के लिए रैफर कर देते हैं। इससे शिवपुरी जिला अस्पताल से मरीजों का धीरे-धीरे मोह भंग होता जा रहा हैं। इसका परिणाम यह है कि दिन प्रतिदिन उपचार कराने वाले लोग कहीं तो अपना उपचार कराने के लिए झांसी,ग्वालियर के लिए जाते या फिर कोटा राजस्थान में उपचार कराने पर विश्वास रख रहे हैं। वहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भले मानव सेवा के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ावा देने में लगे हों लेकिन शिवपुरी में जिला अस्पताल स्वयं अपने उपचार कराने की कगार पर खड़ी हैं। क्योंकि जिला अस्पताल में चिकित्सकों द्वारा कागजी कार्यवाही और निर्माण के  अलावा और कोई दूसरा काम नहीं हो रहा हैं। भले मरीज तड़प-तड़प कर दम तोड़ दे तो चिकित्सकों को उससे कोई लेना देना नहीं हैं।

न पट्टी न निडिल कैसे हो मरीजों का उपचार

जिला अस्पताल शिवपुरी में पिछले काफी समय से घायल होकर आ रहे मरीजों को मल्लम पट्टी कराना पहली प्राथमिकता होती हैं। यह सुविधा भी हमारे जिला अस्पताल में उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं क्योंकि तड़पते घायल मरीज के परिजनों को तत्काल ट्रोमासेंटर में कार्य करने वाले कर्मचारियों द्वारा एक शिल्पि पकड़ा दी जाती हैं और कह दिया जाता है कि जाओ तत्काल पट्टी और रूई का पैकेट लेकर आओ तभी तुम्हारे मारीज को मल्लम पट्टी हो सकेगी। ऐसी स्थिति में अपने घायल मरीजों को दम दिलाने वाला परिजन बेचारा वैसे ही तो परेशान और ऊपर से जिला अस्पताल के स्टाफ द्वारा दर्द से राहत देने की जगह उसे दर्द देने का काम और किया जा रहा हैं। वहीं जिला अस्पताल में मरीजों को इंजेक्शन लगाने के लिए निडिल की सख्त आवश्यकता होती हैं वह भी जिला अस्पताल में उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।

चिकित्सालय में चिकित्सकों की हटधर्मिता

जिला चिकित्सालय में काफी दिनों उपचार करा रहे विद्यापुरी गोस्वामी ने बताया कि मैं पिछले काफी समय से जिला चिकित्सालय में सड़क दुर्घटना में घायल होकर आया था। जिसके उपचार के लिए मैं जिला अस्पताल में पिछले 15 दिन तक भर्ती रहा जिसमें सिर्फ एक बार ड्रेसिंग की गई। जबकि मैने ड्रेसिंग के लिए कई बार स्टाफ नर्स सहित चिकित्सकों को बोली लेकिन उन्होंने ने भी कोई सुनवाई नहीं की तब मैने अपने एक सहयोगी से कहा कि भाई मेरा पैर का घाव गलाव देने लगा मेरी ड्रेसिंग बदलवा दो तो ट्रोमा सेंटर के कर्मचारियों ने कहा कि जाओ पट्टि और रूई ले आओ तभी तुम्हारी ड्रेसिंग हो सकेगी। इतना ही नहीं जिला अस्पताल के कई चिकित्सक कहीं तो प्लेटों के नाम पर तो कहीं ऑपरेशन के नाम पर भी लगातार पैसों की मांग करने के मामले भी संज्ञान में आए हैं और यदि पैसे नहीं देते तो चिकित्सक मरीजों को दुत्कार कर भगा देते हैं ऑपरेशन के लिए मरीजों को डाले रखते हैं। इसके बाद जिला प्रशासन इन चिकित्सकों के खिलाफ कार्यवाही तक नहीं करता।

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