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भ्रष्टाचारियों ने सूचना के अधिकार का बनाया मखौल, आठ हजार जमा कराकर भी नहीं दे रहे जानकारी

शिवपुरी। मध्यप्रदेश में चहुंओर भ्रष्टाचार का बोलबाला है। ऐसे ही भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए जब कोई जागरुक नागरिक सूचना का अधिकार के तहत जानकारी मांगता है तो यह भ्रष्टाचार में लिप्त प्रशासनिक मशीनरी द्वारा उक्त नागरिक को जानकारी न देते हुए जानकारी को दबाने का भरपूर तरीके से प्रयास किया जाता है, साथ ही आवेदनकर्ता को जानबूझकर अनावश्यक नियमों में उलझाकर मानसिक एवं आर्थिक रूप से प्रताडि़त किया जाता है। इसी तरह का वाक्या नगरपालिका परिषद शिवपुरी में सामने आया है। जागरुक नागरिक अशफाक खान द्वारा आरटीआई के माध्यम से नगरपालिका कार्यालय से सीएमओ कक्ष में आचार संहिता में बनाई गई लेटरिन, बाथरूम, रेलिंग, गेट निर्माण आदि संबंधी फाइल के दस्तावेज एवं कैशबुकों की प्रमाणित प्रतियां भी मांगी गई थी, लेकिन जानकारी देने की बजाय संबंधित जिम्मेदार अधिकारियोंं ने आवेदनकर्ता को आठ हजार रुपए का नोटिस थमाकर हतोत्साहित करने का प्रयास किया। खासबात यह है कि जिम्मेदारों का दांव उन्हीं पर उस समय भारी पड़ गया जब अशफाक द्वारा नगरपालिका कार्यालय में जाकर आठ हजार रुपए जमा करा दिए गए। अब अधिकारी जानकारी देने के बजाय बगलें झांकते नजर आ रहे हैं।

जानकारी के अनुसार आरटीआई कार्यकर्ता अशफाक खान द्वारा विगत 1 दिसंबर 2018 को नगर पालिका परिषद शिवपुरी द्वारा विधानसभा चुनाव के दौरान लागू आदर्श आचार संहिता में नियम विरुद्ध किए गए निर्माण कार्यों की आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई। आवेदन प्राप्त होने के बाद नगरपालिका में हड़कंपपूर्ण स्थिति निर्मित हो गई। आरटीआई आवेदनकर्ता को हतोत्साहित करने के मकसद से नगरपालिका द्वारा पत्र क्रमांक 3818 दिनांक 17 दिसम्बर 2018 को ह्यअशफाक खान के नाम जारी कर दिया जिसमें लोकसूचना अधिकारी एवं सीएमओ के हवाले से जानकारी प्राप्त करने के ऐवज में आठ हजार रुपए जमा करने का उल्लेख किया गया। जैसे ही 18 दिसम्बर को अशफाक को उक्त पत्र प्राप्त हुआ तो उसके जबाव में 20 दिसम्बर को श्री खान द्वारा आठ हजार की राशि जमा करा दी गई। जिसका बुक क्रमांक 292 और रसीद क्रमांक 38 है। राशि जमा कराने के बाद नगरपालिका के जिम्मेदारोंं के पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उनका दांव उन पर ही भारी पड़ गया। नगरपालिका के तथाकथित भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों ने तो सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कार्यकर्ता द्वारा आठ हजार की राशि जमा कर दी जाएगी। अब पांच दिन गुजरने के बाद भी नगरपालिका के लोक सूचना अधिकारी द्वारा उक्त जानकारी उपलब्ध नहीं कराई है। 

पुरातत्व विभाग की बिना अनुमति एवं बिना टेंडर प्रक्रिया के आचार संहिता में कराया था निर्माण

यहां बता दें कि नगरपालिका का भवन पुरातत्व विभाग के अधीन है और कुछ वर्ष पूर्व पुरातत्व विभाग द्वारा नगरपालिका को भवन खाली करने का नोटिस भी जारी किए गए। नियमों की बात करें तो पुरातत्व विभाग के भवन के आसपास 100 मीटर के दायरे तक कोई भी निर्माण बिना विभाग की स्वीकृति के नहीं किया जा सकता, लेकिन नगरपालिका के जिम्मेदारों द्वारा बिना पुरातत्व विभाग की स्वीकृति एवं बिना टेंडर प्रक्रिया के ही सीएमओ कक्ष में लेटरिन, बाथरूम सहित अन्य निर्माण कार्य करा दिए। खासबात यह है कि जब उक्त निर्माण कार्य कराया गया था उस समय पूरे प्रदेश सहित जिलेभर में आदर्श आचार संहिता लागू थी। 

जब जानकारी उपलब्ध नहीं करानी थी तो आखिर पत्र क्यों भेजा..?

यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि यदि लोक सूचना अधिकारी को उक्त जानकारी उपलब्ध करानी ही नहीं थी तो उनके द्वारा आठ हजार रुपए जमा करने का पत्र भिजवाया ही क्यों गया था? जिस तरह से मामले में समय गुजरता जा रहा है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मामले को रफादफा करने के भरसक प्रयास किए जा रहे हैं क्योंकि अधिकारियों के पास उक्त जानकारी है ही नहीं यदि जानकारी होती तो अब तक उपलब्ध करा दिया गया होता। जबकि नियमानुसार बात करें तो शुल्क जमा करने के तुरंत बाद ही आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराया जाना अनिवार्य होता है।

पत्र में सूचना के पृष्ठों का नहीं किया उल्लेख

लोकसूचना अधिकारी द्वारा आवेदक को दिए गए पत्र में आठ हजार की राशि का उल्लेख तो कर दिया, लेकिन उसमें सूचना के पृष्ठों का उल्लेख नहीं किया गया। नियमानुसार बात करें तो 2 रुपए पृष्ठ के हिसाब से शुल्क जमा कराया जाता है। इस प्रकार आठ हजार के शुल्क के बदले में चार हजार पृष्ठों की जानकारी उपलब्ध कराई जाना है। अब आगे यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी नगरपालिका कार्यालय से उपलब्ध कराई जाएगी या फिर…।

अशफाक पूर्व में भी करा चुके हैं नपा को 25 हजार का फायदा

यहां बता दें कि नगरपालिका में फर्जी मजदूरी की किताब के माध्यम से एक व्यक्ति द्वारा विवाह सहायता योजना के तहत 25 हजार की राशि नगरपालिका से प्राप्त कर ली थी। उक्त मामले को आरटीआई के माध्यम से श्री खान द्वारा उजागर किया था और बाद में तत्कालीन सीएमओ रणवीर कुमार ने गलत तरीके से शासन की योजना का लाभ लेने वाले व्यक्ति के खिलाफ पुलिस में धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज कराया गया था। परिणामस्वरूप श्री खान की मेहनत रंग लाई और नगरपालिका के कोष में 25 हजार रुपए की राशि वापस मिली।

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