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गुरिल्ला युद्ध में अंग्रेजों को नाकों चने चबाने वाले थे वीर सेनानी तात्याटोपे | Shivpuri News

अमर शहीद वीर सेनानी तात्याटोपे के बलिदान दिवस पर विशेष
शिवपुरी। अप्रतिम प्राकृतिक सौन्दर्य की नगरी शिवपुरी का नाम विश्व के नक्शे पर विख्यात होने का एक महत्वपूर्ण कारण अमर शहीद तात्याटोपे को इस भूमि पर फांसी दिया जाना है। प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी वीरता, साहस व सूझबूझ से अनेक अंग्रेज सेनापतियों के यश को फीका करने वाले इस नर शार्दूल के जुझारूपन का लोहा अंग्रेज भी मानते थे। गुरिल्ला युद्ध में अंग्रेजों को नाकों चने चबाने वाले इस वीर सेनानी ने शिवपुरी को अपनी रणस्थली बनाया और स्वतन्त्रता यज्ञ की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहूति देकर इसे गौरवान्वित किया।
शिवपुरी का प्राकृतिक सौन्दर्य, सुखद वातावरण, हरे-भरे वृक्ष तथा कल-कल करते झरने जहां जनजीवन में चेतनता का संचार करते हैं और सेलानियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। वहीं अमर शहीद तात्याटोपे का स्मारक देश पर सर्वस्व अर्पित करने का सन्देश तो देता ही है साथ ही वर्तमान एवं भावी पीढ़ी को अपना सर्वस्व देकर भी देश का मस्तक ऊँचा करने वाले अमर सेनानियों के क्रियाकलापों, अदम्य साहस और उनके जीवन के बारे में और अधिक जानने तथा उनका अनुसरण करने की प्रेरणा भी देता है।
अमर शहीद तात्याटोपे का जन्म महाराष्ट्र के नासिक जिले के यवला ग्राम में 6 जनवरी सन् 1814 में हुआ। इनके पिता का नाम पांडुरंगराव भट्ट तथा मां का नाम रूकमणी था। तात्याटोपे पेशवा के यहां कार्यरत थे। नाना साहब पेशवा के क्रान्ति क्षेत्र में प्रवेश के पश्चात् ही तात्याटोपे के राष्ट्र भक्ति युक्त पराक्रम का उदय हुआ। 20 जून 1858 को ग्वालियर के युद्ध में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई द्वारा भारत माता के चरणों में अपने प्राणों की आहूति देने के बाद सभी क्रान्तिकारी हताश हो गये थे। क्रान्ति के सफल होने की आशायें धूमिल हो चली थीं और क्रान्ति के सूर्य के अस्त होने की आशंका हो गई थी। ऐसे समय में तात्याटोपे ने श्श्गुरिल्ला युद्ध्य्य का श्री गणेश कर आजादी की लड़ाई को निरन्तरता प्रदान की। क्रान्ति का सर्वोच्च नेता बनकर तात्याटोपे ने सेना की कमान अपने हाथ में सम्भाली। जून 1858 से लेकन मार्च 1859 तक तात्याटोपे ने स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी चुनौती जारी रखी।
उत्तर में अलवर से लेकर दक्षिण में नर्मदा के पार नयापुरा तक तथा पश्चिम में उदयपुर से लेकर पूर्व में सागर तक करीब 10 महीने वह अनेक विख्यात अंग्रेज सेनापतियों की नाकों चने चबाता रहा। उस समय जन-जन की जवान पर तात्या का ही नाम था। इस एक नाम से परेशान अंग्रेज शासन जब सैनिक शक्ति के बल पर तात्या को गिरतार करने में असफल हो गया तो अंग्रेजों ने हल का मार्ग अपनाया। येन-केन प्रकारेण 7 अप्रैल 1859 की रात तात्याटोपे को अंग्रेज सेना द्वारा गिरतार कर 8 अप्रैल को सुबह सेनापति मींड के कैम्प में लाया गया। तत्पश्चात 10 अप्रैल 1859 को शिवपुरी में तात्याटोपे का कोर्ट मार्शल हुआ। कैप्टन बाध कोर्ट मार्शल के अध्यक्ष थे तथा इसमें 4 अन्य सदस्य थे। शिवपुरी में एक अधिकारी के बंगले में न्यायालय लगा। न्यायालय के समक्ष तात्याटोपे ने एक वयान दिया जो काफी लम्बा स्पष्ट और तथ्यपूर्ण है। इस बयान पर उसने मराठी भाषा की मोडी लिपि में श्श्तात्याटोपे कामदार नाना साहब बहादुर्य्य हस्ताक्षर किये इस बयान में क्रान्ति की समस्त गतिविधियों और घटनाओं का क्रमवार सम्बद्ध वर्णन है जिसे पढ़कर उनकी स्मरण शक्ति तथा राजनीतिक सूझबूझ का पता चलता है। 
तात्याटोपे ने अपने बयान में कहा – श्श्मुझ पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया है, किन्तु मैं अंग्रेजों की प्रजा कभी नहीं रहा और न वे यहां के राजा हैं। अतरू मुझ पर राजद्रोह का आरोप लगाया ही नहीं जा सकता्य्य किन्तु इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और तात्याटोपे को मृत्यु दण्ड देने का आदेश दिया गया। तद्नुसार 18 अप्रैल 1859 को उन्हें शिवपुरी में फांसी दिया जाना निश्चित किया गया। निश्चित तारीख को शाम 5 बजे उन्हें उस मैदान पर लाया गया जहां पहले केवल एक चबूतरा सा था और आज तात्याटोपे की विशाल प्रतिमा स्मारक के रूप में प्रतिस्थापित है। फांसी स्थल पर सेना का भारी प्रबन्ध था।
तात्याटोपे के लाये जाने के बाद मेजर मीड़ ने आरोप पत्र और कोर्ट मार्शल का आदेश पढ़ा। तदोपरान्त तात्याटोपे फांसी के फन्दे की ओर स्वतरू बढ़े और उसे गले लगा लिया। फांसी के समय उन्होंने अपनी आंख बंधवाने से भी इन्कार कर दिया। अन्त तक उनके चेहरे पर शांति तथा निडरता का भाव रहा। तात्याटोपे का दैहिक स्वरूप भले ही आज हमारे बीच नहीं है परन्तु उसकी झलक आज भी उस विशाल प्रतिमा में दृष्टव्य है जो शिवपुरी-पोहरी मार्ग पर अवस्थित राजेश्वरी मन्दिर के निकट, प्राचीन महल प्रांगण के करीब ही स्थापित है। यह स्मारक आज भी  उनके बलिदान की अमर कहानी कह रहा है।
6 जनवरी और 18 अप्रैल शिवपुरी के लिए अविस्मरणीय दिवस है। हर साल 18 अप्रैल को बड़ी संख्या में नर-नारी अमर शहीद तात्याटोपे प्रतिमा स्थल पर एकत्रित होकर अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इस अवसर पर वीरांगना लक्ष्मीबाई तथा तात्याटोपे द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले अस्त्र-शस्त्रों की एक प्रदर्शनी लगाई जाती है। इसमें अस्त्र-शस्त्रों के अलावा हस्तलिखित पत्र, दस्तावेज और अन्य स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों के चित्र प्रदर्शित किये जाते हैं। 
तो आइए! आज 18 अप्रैल को अमर शहीद वीर सेनानी तात्याटोपे के बलिदान दिवस पर हम आप सब मिलकर अमर सेनानी को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करें।
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