
- पहली बार 2012 में 200वां जन्मदिन मनाया गया था, दस हजार लोग गवाह बने थे
- पर्यावरण दिवस के दिन (5 जून) हर साल जन्मदिन मनाया जाता है, इसमें सैकड़ों लोग शामिल होते हैं
- पेड़ के संरक्षण के लिए लोगों ने एक कमेटी बनाई, जिसमें प्रकाशक, शिक्षक और सेना के पूर्व जवान शामिल
गुवाहाटी. असम के बारपेटा जिले में स्थित बरगद का पेड़ 207 साल का हो गया। इस मौके पर जलीखेती गांव के लोगों ने पांच जून को पेड़ का जन्मदिन मनाया। पेड़ के 200 साल पूरे होने पर सबसे पहले 2012 में जन्मदिन मनाया गया था। उसके बाद हर साल पर्यावरण दिवस के दिन पेड़ का जन्मदिन मनाया जाने लगा। 2012 में जन्मदिन के मौके पर 62 किलोग्राम का केक काटा गया था। दस हजार लोग इसके गवाह बने।
पेड़ की देखरेख के लिए कमेटी बनाई गई है
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इस गांव के भास्कर कलिता ने कहा कि इस साल हमारे पेड़ की उम्र 207 साल पूरी हो चुकी है। कलिता पेड़ की देखरेख करने वाली कमेटी के प्रमुख हैं। कमेटी में कई क्षेत्रों में काम करने वाले लोग शामिल हैं। इसमें प्रकाशक, शिक्षक और सेना के पूर्व जवान शामिल हैं।
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कलिता ने कहा, ”दूसरों को लगता है कि हम बेकार में ऐसा कर रहे हैं, लेकिन हम जानते हैं कि हमारा पेड़ कितना खास है। 2012 से हर साल गांव वालों ने जन्मदिन मनाना शुरू किया। 2012 में मीडिया ने बड़े स्तर पर इसका कवरेज किया था। लेकिन अगले दिन लोग इसे भूल गए।
इस गांव के भास्कर कलिता ने कहा कि इस साल हमारे पेड़ की उम्र 207 साल पूरी हो चुकी है। कलिता पेड़ की देखरेख करने वाली कमेटी के प्रमुख हैं। कमेटी में कई क्षेत्रों में काम करने वाले लोग शामिल हैं। इसमें प्रकाशक, शिक्षक और सेना के पूर्व जवान शामिल हैं।
कलिता ने कहा, ”दूसरों को लगता है कि हम बेकार में ऐसा कर रहे हैं, लेकिन हम जानते हैं कि हमारा पेड़ कितना खास है। 2012 से हर साल गांव वालों ने जन्मदिन मनाना शुरू किया। 2012 में मीडिया ने बड़े स्तर पर इसका कवरेज किया था। लेकिन अगले दिन लोग इसे भूल गए।
बच्चों के लिए ज्ञान का केंद्र है पेड़: प्रोफेसर
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गुवाहाटी विश्वविद्यालय के रिटायर्ड बॉटनी के प्रोफेसर एसके बारठाकुर ने कहा कि बहुत सारे लोगों का मानना है कि पेड़ पर देवताओं और हमारे समुदाय के रक्षक निवास करते हैं। लोगों में यह आम धारणा है कि बरगद के पेड़ डरावने होते हैं। लेकिन जलीखेती के लोगों के लिए यह पेड़ इससे बढ़कर है। यह खोए हुए लोगों के लिए लैंडमार्क है। बच्चों के लिए ज्ञान का केंद्र है।
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बारठाकुर ने कहा, ‘‘मैंने पेड़ को नहीं देखा है, इसलिए मैं यह नहीं बता सकता कि सच में फंगस से पेड़ को नुकसान पहुंच रहा है। अधिकांश पेड़ों में लाइकेन (काई) होता है, जो एक प्रकार का कवक है। यह पेड़ों को खुद को नवीनीकृत करने में मदद करता है।’’
गुवाहाटी विश्वविद्यालय के रिटायर्ड बॉटनी के प्रोफेसर एसके बारठाकुर ने कहा कि बहुत सारे लोगों का मानना है कि पेड़ पर देवताओं और हमारे समुदाय के रक्षक निवास करते हैं। लोगों में यह आम धारणा है कि बरगद के पेड़ डरावने होते हैं। लेकिन जलीखेती के लोगों के लिए यह पेड़ इससे बढ़कर है। यह खोए हुए लोगों के लिए लैंडमार्क है। बच्चों के लिए ज्ञान का केंद्र है।
बारठाकुर ने कहा, ‘‘मैंने पेड़ को नहीं देखा है, इसलिए मैं यह नहीं बता सकता कि सच में फंगस से पेड़ को नुकसान पहुंच रहा है। अधिकांश पेड़ों में लाइकेन (काई) होता है, जो एक प्रकार का कवक है। यह पेड़ों को खुद को नवीनीकृत करने में मदद करता है।’’
पेड़ को बचाने के लिए मंदिर भी बनाया गया
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कलिता ने बताया- वैज्ञानिक रूप से पेड़ की उम्र निर्धारित नहीं की गई है। हम बुजुर्गों से सुनते आ रहे हैं कि पेड़ की उम्र 200 साल से ऊपर है। कलिता के दादा पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने 1901 में पेड़ के ठीक बगल में शिव मंदिर का निर्माण कर वृक्ष के संरक्षण में मदद की थी।
कलिता ने बताया- वैज्ञानिक रूप से पेड़ की उम्र निर्धारित नहीं की गई है। हम बुजुर्गों से सुनते आ रहे हैं कि पेड़ की उम्र 200 साल से ऊपर है। कलिता के दादा पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने 1901 में पेड़ के ठीक बगल में शिव मंदिर का निर्माण कर वृक्ष के संरक्षण में मदद की थी।
‘वैज्ञानिक रूप से पेड़ की उम्र जांची जाएगी’
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असम के मुख्य वन संरक्षक हेमकांता तालुकदार ने कहा कि हम इसे एक पर्यटक स्थल के रूप में विकसित नहीं कर सकते हैं। लेकिन, हम वैज्ञानिक रूप से जांच कर जल्द ही इसकी प्रामाणिकता की पुष्टि करेंगे।
असम के मुख्य वन संरक्षक हेमकांता तालुकदार ने कहा कि हम इसे एक पर्यटक स्थल के रूप में विकसित नहीं कर सकते हैं। लेकिन, हम वैज्ञानिक रूप से जांच कर जल्द ही इसकी प्रामाणिकता की पुष्टि करेंगे।




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