
बिलासपुर। गबन के आरोप में बैंक कर्मी को बर्खास्त करने के आदेश को हाईकोर्ट ने निरस्त किया है। साथ ही सभी देयकों का भुगतान करने का आदेश दिया है। मुकदमे के लंबित रहने के दौरान कर्मचारी की मौत हो गई। इसके बाद उनके विधि वारिस ने मुकदमा लड़ा। 37 वर्ष की लंबी लड़ाई के बाद उसे हाईकोर्ट से न्याय मिला है।
अच्छे लाल दुबे जिला केन्द्रीय सहकारी बैंक मर्यादित बिलासपुर में कैशियर के पद में कार्यरत थे। बैंक के ऑडिट में उनके कैश में दो लाख 40 हजार रुपये कम पाया गया। इस आर्थिक अनियमितता के आधार पर बैंक प्रबंधन ने 1982 में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया।
उन्होंने बर्खास्तगी आदेश के खिलाफ उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं के समक्ष परिवाद पेश किया। यहां से राहत नहीं मिलने पर पंजीयक सहकारी संस्था एवं सहकारिता न्यायधिकरण में तक अपील की। सहकारिता ट्रिब्यूनल ने 1999 में अपील खारिज कर दी। इस पर 1999 में उन्होंने एमपी हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
राज्य बनने के बाद मामले को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भेजा गया। याचिका के लंबित रहने के दौरान ही याचिकाकर्ता की मौत हो गई। इसके बाद उनके विधिक वारिस ने प्रकरण को आगे बढ़ाया। 19 वर्ष बाद जस्टिस पी. सेम कोशी के कोर्ट में मामले की अंतिम सुनवाई हुई।
न्यायालय ने पाया कि बैंक प्रबंधन ने बर्खास्त करने की प्रक्रिया का पालन नहीं किया है। याचिकाकर्ता को पक्ष रखने का अवसर दिए बिना ही बर्खास्त किया गया। कोर्ट ने इस न्याय के सिद्घांत के विपरीत होने पर बैंक प्रबंधन की समस्त कार्रवाई को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता के विधिक वारिस को उनके समस्त देयकों का भुगतान करने का आदेश दिया है।





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