
*दुर्गो आसकरण रो , नित उठ बागाँ जाय |*
*अमल ऊतरे औरंग रो, दिल्ली धड़का खाय ||*
*आठ पहर चौसठ घडी, घुडले ऊपर वास |*
*सैल अणि हूँ सेकतो , बाटी दुर्गादास ||*
*नौ कूँटी मारवाड़ के वीर शिरोमणि , स्वामिभक्त , साहस , शौर्य और त्याग की अद्वितीय प्रतिमूर्ति श्री राष्ट्र वीर दुर्गादास जी राठौर को उनकी 381वीं जयंती पर कोटिशः नमन्*
दुर्गादास राठौड़ ने पराक्रम, बलिदानी भावना, स्वदेशप्रेम और स्वाधीनता का प्रादर्श रचा था! वे जीवन के हर मुकाम पर खरे उतरे हैं। फिर चाहे वह राजनीति हो, कूटनीति हो या फिर शत्रु का संहार करने की नीति। उन्हें हर मोड़ पर अव्वल ही पाया गया है।लेकिन निराशा है इस बात की कि दुनिया ने उन्हें महज़ एक अच्छा योद्धा कहकर ही सम्मानित किया है। लेकिन इससे कई बढ़कर हैं ‘वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़’। वे मात्र एक वीर नहीं थे, वे मात्र एक अच्छे योद्धा नहीं थे, बल्कि इससे बढ़कर वे एक महान राजनीतिज्ञ थे जिसे दुनिया को याद रखना चाहिए। यह जानकारी डॉ रामजी दास राठौर ने 381वीं दुर्गादास राठौड़ जयंती के अवसर पर दी!
दुर्गादास राठौड़ के बारे में जो सामान्यत: बातें प्रचलित हैं वह उनकी बहादुरी को लेकर हैं। जिस समय उनका शासन था उस समय भारत के अधिकतम राज्यों पर मुगल बादशाह औरंगजेब की नज़र थी। चारों ओर छोटे-छोटे राजा अपने-अपने राज्यों को बचाने में लगे हुए थे।लेकिन अपनी तलवार के ज़ोर पर औरंगजेब ने कई सारे राज्य धीरे-धीरे करके अपने हिस्से में ले लिए। उस समय औरंगज़ेब की तलवार से हर कोई कांपता था, लेकिन यदि उसकी क्रूरता के सामने कोई टकराने की हिम्मत रखता था तो वह थे दुर्गादास राठौड़।
वीर दुर्गादास राठौड़ का जन्म 13 अगस्त 1638 (विक्रम सम्वत 1695 श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि) के दिन हुआ था. इनके पिता का नाम श्री आसकरण था. माता नेतकँवर थीं. इनके पिता जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह की सेना में सेनापति थे. वीर दुर्गादास राठौड़ अपने पिताजी की तरह ही पराक्रमी और वीर योद्धा थे. आसकरण की अन्य पत्नियां भी थी. दुर्गादास राठौड़ का लालन-पालन उनकी मां नेतकँवर ने ही किया और उनमें देश भक्ति और धार्मिक संस्कार डाले!उनका बचपन कृषि कार्य करते बीता था, जिस माहौल में वे बढ़े हुए वहां उन्हें शिक्षा मिलने का कोई स्रोत नहीं था। दरअसल दुर्गादास की मां एक वीर नारी थी, उनकी वीरता के चर्चे सुनकर ही जोधपुर के सामंत आसकरण ने उससे शादी की। लेकिन दोनों का रिश्ता कुछ ज्यादा समय तक चल ना सका, एवं अंत में आसकरण ने दुर्गादास व उसकी माता को जीवन गुजारने के लिए कुछ भूमि देकर अपने से दूर कर लिया। पति से अलग होने के बाद दुर्गादास की मां ने अपने पुत्र के साथ ही जीवन व्यतीत करने का फैसला किया। एक दिन दुर्गादास के खेतों में जोधपुर सेना के ऊंटों द्वारा फसल उजाड़ने को लेकर चरवाहों से मतभेद हो गया और दुर्गादास ने राज्य के चरवाहे की गर्दन काट दी। फलस्वरूप जोधपुर के सैनिकों द्वारा दुर्गादास को महाराजा जसवंतसिंह के सामने पेश किया गया। दरबार में बैठे उसके पिता ने तो उस वक्त उसे अपना पुत्र मानने से भी इनकार कर दिया था। लेकिन महाराजा जसवंत सिंह ने बालक दुर्गादास की निडरता, निर्भीकता देख उसे क्षमा ही नहीं किया वरन् अपने सुरक्षा दस्ते में भी शामिल कर लिया। इसी घटना के बाद दुर्गादास का जीवन बदल-सा गया। वह हर पल महाराज के पास रहते, उनसे राजनीति, कूटनीति के साथ ही साहित्य का भी ज्ञान हासिल करते। महाराजा की यही सीख दुर्गादास के तब काम आई जब महाराज का निधन हो गया। उनके निधन के बाद ही राज्य में ऐसी परिस्थितियों पैदा हुईं जिन्हें बड़ी होशियारी से दुर्गादास ने संभाल लिया। इसमें कोई दो राय नहीं कि राज्य में दुर्गादास राठौड़ के पास कोई खास पद नहीं था, लेकिन अपनी प्रतिभा से वह पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे। दुर्गादास की कूटनीतियों में इतना जोर था कि उसने औरंगजेब के पुत्र, अकबर द्वितीय तक को उसके खिलाफ कर दिया था। औरंगजेब के पुत्र अकबर अपने पिता की बातों को मानने से साफ इनकार कर रहे थे, अपने पिता के खिलाफ विद्रोह किया लेकिन इतना कुछ करने के बाद जब स्वयं अकबर को अपने पिता से किसी प्रकार का सहयोग हासिल ना हुआ तब दुर्गादास ने ही अपने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों से अकबर की मदद की! उन्होंने एक ही ध्येय रखा कभी निष्ठा मत बदलो, जो व्यक्ति बार बार निष्ठा बदलता है वही लालच में आकर षड़यंत्रों में फंस अपना नुकसान खुद करता है।
22 नवंबर 1718 में दुर्गादास राठौड़ का निधन हो गया!लाल पत्थर से बना उनका अतिसुंदर छत्र आज भी उज्जैन में चक्रतीर्थ नामक स्थान में शुशोभित है. जो सभी राजपूतो और देशभक्तों के लिए तीर्थ स्थान है!वीर दुर्गादास राजपूती साहस, पराक्रमी और वफादारी का एक उज्वल उदाहरण है!वह दुर्गादास राठौड़ ही थे जिन्होंने औरंगजेब की पूर्ण इस्लामीकरण की साजिश को विफल किया था और सनातन धर्म की रक्षा की थी!इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने दुर्गादास राठौड़ के बारे में कहा है कि, “उनको न मुगलों का धन विचलित कर सका और न ही मुगलों की शक्ति उनके दृढ निश्चय को पीछे हटा सकी, बल्कि वो ऐसा वीर था जिसमे राजपूती साहस और कूटनीति मिश्रित थी”!






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